भजन शत लीला [बयालीस लीला]

भजन शत लीला वृंदावन के रसिक संत श्री ध्रुवदास द्वारा रचित है। भजन शत लीला, बयालीस लीला पुस्तक का एक हिस्सा है। भजन शत लीला श्री राधा कृष्ण को समर्पित एवं भजन मार्ग के सौ दोहों का संग्रह है। लेखक: श्री हित ध्रुव दास

13 लेख उपलब्ध हैं

  1. दुर्लभ वृंदा-विपिन है, राख्यौ सब तें गोइ - श्री ध्रुवदास, भजन शत (73)

    श्री वृन्दावन धाम अत्यंत गोपनीय, दिव्य और देवताओं के लिए भी दुर्लभ है। अतः जो व्यक्ति भक्तिभाव से रहित और अभागा है, वह यहाँ कैसे वास प्राप्त कर सकता है?

  2. भक्त प्रकार अनेक विधि, मन-मन औरै बात - श्री ध्रुवदास, भजन शत (57)

    भक्तों के अनेक प्रकार होते हैं और उनके भीतर भक्ति-भाव और साध्य भी भिन्न-भिन्न होते हैं, पर जो अनन्य भक्त वृन्दावन-युगल-केलि-रस के रसिक होते हैं, उन्हें युगल-विहार के अतिरिक्त कोई दूसरी वस्तु रुचिकर नहीं लगती।

  3. धावत वृंदा विपिन तजि, जे जन आन विचारि - श्री ध्रुवदास, भजन शत (72)

    जो लोग स्वार्थ से प्रेरित होकर वृन्दावन-रज का परित्याग कर अन्य स्थानों को चले जाते हैं, मानो वे अनधिकारी होने के कारण इस अलौकिक भूमि से निष्कासित कर दिए गए हों।

  4. भयौ न रसिकन संग जौ - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, भजन शत (26)

    रसिक भक्तों के संग के अभाव में और प्रेम-रंग में रंगे बिना मन वश में नहीं होता, जैसे पारस-मणि के स्पर्श के बिना लौह-धातु कदापि स्वर्ण-रूप में परिवर्तित नहीं होती।

  5. पिय-प्यारी के पद-कमल - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, भजन शत (38)

    श्री ध्रुवदास जी मन को सावधान करते हुए कहते हैं— ‘हे मन! तू श्री लाड़िली-लाल के चरण-कमलों का ही अहर्निश ध्यान करता रह और अनन्य-भजन की परिपाटी में अन्य किसी को सम्मिलित मत कर।’

  6. नवल-प्रिया छवि बसत रहौ - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, भजन शत (61)

    मेरे नेत्रों में नवलप्रिया श्री राधा की यह ध्यान-छवि सदैव विराजित रहे कि वे प्रियतम के कण्ठ में अपनी ललित बाहुलता अर्पित किए हुए वृन्दावन की सघन लता-कुञ्जों से होकर निकल रही हैं।

  7. जे सेवत वृन्दाविपिन - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, भजन शत (59)

    जो भक्त वृन्दावन का सेवन करते हैं और युगल श्री श्यामा-श्याम के उपासक हैं एवं युगल रस में लीन हैं, वे वैकुण्ठ के सुखों की ओर आँख भर भी नहीं डालते।

  8. नौतन वैस किसोर छबि - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, भजन शत (59)

    जिस रसिक भक्त के हृदय में नव किशोर वपु श्री लाडिली-लाल सदैव विराजते हैं, उसके चित्त में तो श्री कृष्ण की पौगण्ड, बाल-लीला आदि की भी विशेष रूचि नहीं रह जाती।

  9. सकल आयु सत कर्म में - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, भजनशत (95)

    यद्यपि किसी व्यक्ति ने जीवनपर्यंत केवल सत्कर्म ही संचित किए हों, तथापि श्रीहरि के अनन्य भक्तों के प्रति किया गया लेशमात्र (सूक्ष्म) अपराध भी उसके समस्त पुण्यों को क्षण भर में भस्मीभूत कर देता है।

  10. वंदावन रस रीति - श्री ध्रुवदास , भजन शत लीला (103)

    श्री ध्रुवदास जी कहते हैं कि उपासक, अपने मन में श्री वृन्दावन की रसमयी उपासना श्री लाडली लाल युगल स्वरूप का (नित्य ही युगल किशोर अवस्था में रहने वाले) सदा चिंतन करता रहे, क्योंकि आयु व्यतीत हुई जा रही है ! इस मधुरतम उपासना से जीव अत्यंत दुर्लभ वृन्दावन रस प्राप्त कर लेगा।

  11. रीति भजन की यहै ध्रुव छाँडो सब की आस - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, भजन शत लीला (52)

    श्रीध्रुवदासजी के अनुसार भजन की वास्तविक पद्धति यही है कि साधक इस नश्वर संसार की समस्त आशाओं का त्याग कर, पूर्ण श्रद्धा और अटूट विश्वास के साथ केवल श्रीश्यामा-श्याम की पावन शरण में स्वयं को समर्पित कर दे।

  12. रे मन रसिकनि-संग बिनु - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, भजन शत (29)

    वृन्दावन-रस की प्राप्ति का एकमात्र साधन रसिक संतों का संग और उनके चरणों में पूर्ण समर्पण ही है। इसके अतिरिक्त किसी भी अन्य साधन, उपाय या प्रयास से उस दिव्य वृन्दावन-रस की उपलब्धि कदापि संभव नहीं है।