छूटक कवित्त [श्री नागरी दास जी की वाणी]

छूटक कवित्त [श्री नागरी दास जी की वाणी] छूटक कवित्त श्री नागरीदास जी की वाणी का एक ऐसा अध्याय है, जिसमें ब्रज धाम एवं श्यामा श्याम की दिव्य लीलाओं के विविध कविताओं का मिश्रण हैं। रचयिता: श्री नागरीदास जी

8 लेख उपलब्ध हैं

  1. ब्रह्मपुरी शिव जू की पुरी - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह), श्री नागरीदास जी की वाणी, छूटक कवित्त (86)

    ब्रह्मलोक, कैलाश और स्वर्गलोक — ये सब चाहे कितने भी महान क्यों न हों, परंतु मेरे हृदय में इनके लिए तनिक भी रुचि नहीं है।

  2. माँगौं न मोष भयोवास घोष - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह) जी की वाणी, छूटक कवित्त (87)

    न मुझे मोक्ष की इच्छा है, न ही मेरे हृदय में अब कोई और चाह शेष है; मेरी तो बस यही अभिलाषा है कि मैं उस ब्रज में निवास करूं, जहां गौएं विचरण करती हैं।

  3. बृज ही मे मोरन के पच्छन कौ - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह), श्री नागरीदास जी की वाणी, छूटक कवित्त (101)

    इस ब्रज भूमि की ही महिमा है कि श्रीकृष्ण ने मोर के पंखों का मुकुट धारण किया है। केवल ब्रज ही में वह केली रस को करने के लिए हर्षोल्लास से परिपूर्ण रहते हैं।

  4. तेरे नैन सावन की कारी अंधियारी घटा - श्री नागरीदास जी की वाणी, छूटक कवित्त

    श्री राधा श्री कृष्ण से कहती हैं: तुम्हारी आँखें यदि श्रावण महीने की वर्षा वाले काले बादलों की तरह हैं, तो मेरे नैन उनके ऊपर भारी गरजने वाले घनघोर बादल के समान हैं।

  5. तेरे नैंन मेरे नैंन मेरे नैंन तेरे नैंन - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह) जी की वाणी, छूटक कवित्त (23)

    श्री राधारानी कहती हैं: तेरे नैंन मेरे नैंन हैं, और मेरे नैंन तेरे नैंन हैं, किसी और ठौर [जगह] हम दोनों के नैंन भूलकर भी नहीं जाते।