श्री पीताम्बर देव जी

श्री पीताम्बर देव जी हरिदास सम्प्रदाय के वृन्दावन के रसिक संत हैं।

10 लेख उपलब्ध हैं

  1. सहचरि देखत दुहुन को - श्री पीतांबर देव जी की बानी (59)

    सहचरी युगल सरकार (श्री राधा-कृष्ण) को अपलक निहारती रहती है, मानो वह पिंजरे में बंद किसी पक्षी के समान हो गई हो। जिस प्रकार पिंजरे का पक्षी अपने स्वामी द्वारा दिए गए दाने-पानी पर ही जीवित रहता है, वैसे ही सखी अपनी भूख-प्यास की निवृत्ति केवल उनके दर्शनों से करती है और निरंतर श्री प्रिया जी के नामों को ही रटती रहती है।

  2. रसिकन के रस दैन कों - श्री पीतांबर देव जी

    अनन्य नृपति, रसिक चूड़ामणि, स्वामी श्री हरिदास रसिकों को श्यामा कुंजबिहारी का अति दुर्लभ अखंड नित्य विहार रस प्रदान करने के लिए ही इस धरा धाम पर प्रकट हुए हैं । ऐसा अति अद्भुत आनंद का स्रोत न पहले हुआ था और न ही आगे होगा।

  3. नित्य सिद्ध श्री स्वामिनी - श्री पीतांबर देव जी, श्री पीतांबर देव जी की बानी

    श्री स्वामिनी जी (श्री राधा) नित्य सिद्ध हैं, और उनके दास एवं परिकर भी नित्य सिद्ध हैं जो सदा नित्य विहार के विलास रस का सेवन करते रहते हैं।

  4. जोरी अद्भुत किन ठई मन रीझे लखि अंग - श्री पीतांबर देव जी की बानी (54)

    यह दिव्य जोड़ी (श्री श्यामा-श्याम) अति अद्भुत एवं समतारहित है, जिनके अंगों का अवलोकन कर मन रीझ जाता है। घन और दामिनी की प्रभा से युक्त इस जोड़ी की उमंग कभी घटती नहीं, अपितु प्रति क्षण बढ़ती जाती है।

  5. मो मन ऐसी अटक परी - श्री पीताम्बर देव जू की वाणी (15)

    श्री पीतांबर देव सहचरी स्वरूप से कहते हैं कि मेरा मन श्री कुंज बिहारी श्री कुंज बिहारिनी के विपिन विहार में ऐसा अटक गया है कि वह नित्य ही प्रिया प्रियतम के दिव्य स्वरूप को निहारता रहता है ।

  6. श्री पीताम्बर देव जी की जीवनी

    नारनौल ग्राम में सांझापुर नामक स्थान है जहाँ एक गौड़ ब्राम्हण कुल के धर्मात्मा रहते थे जिनका नाम श्री चौबेलाल था। ये वेद शास्त्र के पूर्ण ज्ञाता थे तथा बहुत धनवान भी थे। इनका वंश चौबे नाम से विख्यात था। इनकी पत्नी का नाम श्रीमती रामकुँवरि था।

  7. बिहार है आगार रस को - श्री पीताम्बर देव जी, श्री पीताम्बर देव जू की वाणी

    श्री पीताम्बर देव जी वर्णन करते हैं कि रसिकों के अनुग्रह (कृपा) से ही सागररूप (आगार—जिसका आदि और अंत नहीं है) नित्य-विहार-रस की प्राप्ति होती है। किसी साधना या उपासना मात्र से इस रस को समझा नहीं जा सकता, और न ही इस रस की प्राप्ति किए बिना कोई इसके विषय में कुछ कह सकता है।