प्रेमावली [बयालीस लीला]

प्रेमावली श्री बयालीस लीला का इक्कीसवाँ अध्याय है जिसे श्री हित ध्रुवदास जी ने लिखा है ।

8 लेख उपलब्ध हैं

  1. मन वच काइक एक रस धरे महा व्रत प्रेम - श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, प्रेमावली (28)

    मन, वचन और देह तीनों को एक-रस रखकर अर्थात पूरी एकाग्रता से, केवल एक प्रेम का महाव्रत धारण किए हुए, रसिक कुँवर लालजू (श्री कृष्ण) श्रीराधा की सेवा में पूर्णत: तत्पर रहते हैं। उनका श्री राधा को निरंतर सुख पहुंचाना ही एक मात्र सुखमय नियम है। वे अन्य किसी नियम को नहीं मानते।

  2. यह सुख समुझन कौं कछू - श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, प्रेमावली (49)

    वृन्दावन रस का अनुभव किसी साधन या उपाय से संभव नहीं है। केवल श्री किशोरी जी की निष्कारण (अहैतुकी) कृपा ही इसका द्वार खोल सकती है। जब उनकी कृपा-बल से प्रेम का झरोखा खुलता है, तभी इस रस का साक्षात् अनुभव संभव होता है।

  3. ढूँढ़ि फिरै त्रैलोक जो - श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, प्रेमावली (53)

    कोई त्रिलोकी में ढूँढ़ता फिरे तो भी उसे ऐसे सहज प्रेमी कहीं देखने को भी नहीं मिलेंगे जैसे साक्षात् प्रेम स्वरूप श्री राधा कृष्ण सदा एकरस वृन्दावन की निभृत-निकुञ्जों में निवास करते हैं।

  4. रूप-बेली प्यारी बनी, प्रीतम प्रेम-तमाल - श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, प्रेमावली (3)

    श्री प्रिया जी (राधा) साक्षात् रूप और लावण्य की सुकोमल लता हैं, और उनके प्रियतम श्री कृष्ण प्रेम के सुदृढ़ तमाल वृक्ष हैं। जिस प्रकार एक स्वर्ण-लता तमाल के वृक्ष से लिपटी रहती है, उसी प्रकार युगल मनस्तत्त्व का ही मिलित विग्रह श्री राधावल्लभ हैं

  5. ठौर-ठौर पिय रचत हैं आसन कुसुम रसाल - श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, प्रेमावली (74)

    प्रियतम श्री कृष्ण मार्ग में जगह-जगह पुष्पों के सुंदर आसनों का निर्माण करते हैं, यह सोचकर कि न जाने कहाँ अलबेली सरकार श्री राधिका विश्राम करेंगी।

  6. जिनके है यह प्रेम रस - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, प्रेमावली (13)

    जिनको इस प्रेम-रस का अनुभव है, वे ही इसकी रीति जानते हैं। वे कि प्रेम के क्षेत्र में वही जीतता है जो सम्पूर्ण रूप से अपनी पराजय स्वीकार कर लेता है।

  7. अंग अंग सब लाल के - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, प्रेमावली (12)

    श्री श्यामसुन्दर का अंग-अंग श्री प्रिया की ओर झुका रहता है, अर्थात् वे सम्पूर्ण रूप से श्री प्रिया में आसक्त रहते हैं। उनके मन में सहज प्रेम का ढाल लगा हुआ है, अर्थात् उनके मन की सम्पूर्ण वृत्तियाँ श्री प्रिया की ओर दौड़ती रहती हैं। इसका कारण यह है कि वे प्रेम की डोर से बँधे हुए हैं।

  8. तीन लोक चौदह भुवन - श्री ध्रुवदास, बयालिस लीला, प्रेमावली (51)

    श्री ध्रुवदास कहते हैं कि तीन लोकों और चौदह भुवनों में सहज प्रेम के दर्शन कहीं नहीं होते। यह दिव्य प्रेम तो केवल श्रीवृन्दावन धाम में उसी प्रकार देदीप्यमान है, जैसे स्वर्ण (काञ्चन) में जड़ी हुई कोई बहुमूल्य मणि जगमगाती है।