राधिका तापनि उपनिषद

अथर्ववेद से संबंधित यह उपनिषद श्री राधिका की महिमा का वर्णन करता है। राधिका ’शब्द‘ राधा ’शब्द से बना है, जो ‘राध्यति’ से आता है जिसका अर्थ है अत्यंत दयालु। इस शास्त्र में श्री राधा की महिमा का वर्णन है।

10 लेख उपलब्ध हैं

  1. येयं राधा यश्च कृष्णो - अथर्ववेद, श्रीराधिका तापनीयोपनिषत् (12)

    श्रीराधा और श्रीकृष्ण वास्तव में एक ही प्रेम-रस-सागर स्वरूप तत्त्व हैं। केवल अपनी लीलाओं के विस्तार हेतु वे दो रूपों में प्रकट हुए हैं। जैसे छाया से देह की शोभा बढ़ती है, उसी प्रकार श्रीराधा से श्रीकृष्ण शोभायमान होते हैं और दोनों कभी एक-दूसरे से पृथक नहीं होते। इनके दिव्य चरित्रों का श्रवण एवं पठन करने से जीव उनके उस परम निर्मल एवं दिव्य धाम को प्राप्त करता है।

  2. श्रुतय ऊचुः— सर्वाणि राधिकाया - अथर्ववेद, श्रीराधिका तापनीयोपनिषत् (02)

    श्रुतियों ने कहा — समस्त देवताओं की शक्ति श्रीराधिका से ही हैं। समस्त प्राणी श्रीराधिका से ही अस्तित्व में हैं। उन श्री राधिका को हम प्रणाम करते हैं।

  3. क्वचिद् भूत्वा द्विभुजा कृष्णदेहा वंशी - अथर्ववेद, श्रीराधिका तापनीयोपनिषत् (11)

    कभी-कभी श्री राधा द्विभुज श्रीकृष्ण का वेश धारण कर लेती हैं और स्वयं वंशी बजाती हैं। उन श्रीराधिका जू को प्रसन्न करने के लिए देवों के देव श्री कृष्ण स्वयं कुन्द और मन्दार के पुष्पों की मालाएँ बनाकर उन्हें पहनाते हैं और विविध प्रकार से उनकी सेवा करते हैं।

  4. जगद्भर्तुर्विश्वसम्मोहनस्य श्रीकृष्णस्य - अथर्ववेद, श्रीराधिका तापनीयोपनिषत् (6)

    श्रीवृन्दावन की अधिष्ठात्री देवी, श्रीवृन्दावन की पालिका श्रीराधा जिन्हें सम्पूर्ण संसार के अधीश्वर त्रिभुवन मोहन श्रीकृष्णचन्द्र अपने प्राणों से भी अधिक प्रिय मानते हैं, उन श्रीराधिका को हम सदा प्रणाम करते हैं।

  5. यस्याः क्रीडां चन्द्रमा देवपत्न्यो - राधिका तापनीय उपनिषद (8)

    जिनकी दिव्य क्रीड़ा को देखकर चंद्रमा और देवांगनाएँ इतनी मोहित हो जाती हैं कि वे अपने शरीर की भी सुध-बुध खो बैठती हैं। श्रीधाम वृंदावन में जब वे केलि-विहार करती हैं, तो उसका दर्शन कर जड़ वस्तुएँ चलने लगती हैं और चेतन भावावेश में जड़ हो जाती हैं। मैं उन श्रीराधिका को नमन करता हूँ।

  6. यस्या अङ्के विलुण्ठन् - राधिका तापनीय उपनिषद (9)

    जिनके अंक में लेटे हुए श्रीकृष्णचन्द्र अपने शाश्वत विहार-स्थान गोलोक का स्मरण तक नहीं करते, श्री लक्ष्मीजी और श्रीपार्वतीजी जिनकी अंशरूपा हैं, उन समस्त शक्तियों की अधिष्ठात्री श्रीराधिकाजी को हम प्रणाम करते हैं ।

  7. यस्या अगम्यतां श्रुतयः सांख्ययोगा - राधिका तापनीय उपनिषद (5)

    हम सब श्रुतियाँ, सांख्ययोग-शास्त्र तथा उपनिषद् जिन परब्रह्म की अभिन्न स्वरूपा की अगम्यता का प्रतिपादन करती हैं, जिनको स्वरूपतः भली प्रकार पुराण भी नहीं जानते, उन देवताओं की पालिका श्रीराधिकाजी को हम नमस्कार करती हैं ।

  8. यस्या रेणु पादयोर्विश्वभर्ता - राधिकातापनीय उपनिषद (7)

    विश्वभर्ता श्रीकृष्णचन्द्र एकान्त में अत्यन्त प्रेमार्द्र होकर जिनकी पद-धूलि अपने मस्तक पर धारण करते हैं, जिनके प्रेम में निमग्न होने पर उनके हाथ से वंशी भी गिर जाती है एवं अपनी बिखरी अलकों का भी उन्हें स्मरण नहीं रहता तथा ये क्रीतदास की तरह जिनके वश में सदा रहते हैं, उन राधिका को हम नमस्कार करते हैं ।

  9. राध्या सहिते देवो माधवे नैव राधिका - राधा तापनियो उपनिषद

    श्री राधा के सहित जो श्री कृष्ण हैं वही पूर्णतम श्री कृष्ण हैं। जो इन दोनों में भेद रखता है वो कभी संसार के आवागमन से मुक्त नहीं हो सकता। जो श्री राधा कि उपेक्षा करके माधव का सेवन/स्मरण , पठन और कथन वर्णन करता है वह मूढ़ों में भी महामूढ़ हैं।