श्री सरस देव जी

श्री स्वामी बिहारिनी देव जी के शिष्य श्री सरस देव जी, वृंदावन के एक रसिक संत हैं । यह स्वामी हरिदास जी की परंपरा के अष्ट आचार्यों में से एक हैं।

11 लेख उपलब्ध हैं

  1. कर्म धर्म और ज्ञान विज्ञान - श्री सरस देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (4)

    एक नित्य विहार का अनन्य उपासक कहता है कि कर्म, धर्म, ज्ञान, विज्ञान एवं नाना प्रकार की भक्ति को हम अपने ह्रदय में आने नहीं देते । और तो और वेद प्रतिपादित तत्व, साक्षात श्री वैकुण्ठनाथ, भगवान श्री राम, एवं श्री व्रजेंद्र नंदन श्री कृष्ण आदि भगवत स्वरूप का भी हम बखान नहीं करते ।

  2. श्रीबिहारी प्यारी को खिलौना - श्री सरस देव जी की वाणी, सरस विहार रस के पद (10)

    श्री बाँके बिहारी जी महाराज, नित्य विहारिणी श्री प्यारी जू [श्री राधा] के खिलौने के समान हैं जिनके अंगों से विविध प्रकार के रति रंग-रस उत्पन्न होते हैं जो मन को अति मोहने वाले एवं लावण्य युक्त हैं ।

  3. अब हीं बनी है बात, औसर समझि घात - श्री सरस देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (20)

    तेरी बिगड़ी बात बन सकती है, तुझे यह बड़ा सुंदर अवसर मिला है (मानव देह के रूप में) जिससे तू भगवान का भजन कर अपनी बिगड़ी बना सकता है। अब क्यों खिसिया रहा है, अनेक बार समझने के पश्चात भी तेरे को लज्जा नहीं आती ?

  4. जुग मुख छबि बरनी न परै री - श्री सरस देव जी, श्री सरस देव जी की वाणी, सरस विहार रस के पद (16)

    श्री प्रियालाल के मुखारविन्दों की रूप-माधुरी कहते नहीं बनती । परस्पर प्रेम-भरी बातों से इनके दिव्य श्रीअंगों में अनंग का संचार हो रहा है । नयनों ही नयनों में जब ये मुस्कुराते हैं, तब तो सुध-बुध भूलकर एक-दूसरे के हाथों बिक जाते हैं ।

  5. झूलत दोऊ नवल हिंडोलैं - श्री सरस देव जी की वाणी, सरस विहार रस के पद (22)

    श्रीप्रियालाल यमुना-पुलिनस्थ कमल-कुञ्ज में एक नये ही प्रकार के झूले में झूल रहे हैं और दोनों एक-दूसरे को प्रेम-प्रफुल्लित विलोचनों से निहार रहे हैं ।

  6. श्री सरसदेव जी की जीवनी

    श्री सरसदेव जी अपने पूर्वाचार्यों के समान ही सरस एवं परम रसिक अनन्य हुए हैं जो सदैव श्री श्यामा कुँजबिहारी को अपने ह्रदय में बसाये रहते। जीव मात्र इनका मित्र था, पर्वत राज के समान भारी होते हुए भी स्वयं को लघु मानते थे।

  7. जुग मुख छवि बरनी - श्री सरस देव जी, श्री सरस देव जी की वाणी, सरस विहार रस के पद (16)

    श्रीप्रियालाल के मुखारविन्दों की रूप-माधुरी कहते नहीं बनती । परस्पर प्रेम भरी बातों से इनके दिव्य श्रीअगों में प्रेम रूपी अनंग का संचार हो रहा है। नयनों ही नयनों में जब ये मुस्कुराते हैं, तब तो सुध-बुध भूलकर ये एक-दूसरे के हाथों बिक जाते हैं ।

  8. आजु अति राजति नागरी नाहु - श्री सरस देव जी की वाणी, सरस विहार रस के पद (5)

    श्यामाकुंज बिहारी की आज की छवि बड़ी ही मोहक है। दोनों परस्पर गलबहियां दिये वृन्दावन की कुन्ज कुन्ज में भ्रमण करते डोल रहे है।

  9. राजति नव निकुंज नव जोरी - श्री सरसदेव जी, श्री सरस देव जू की बानी (29)

    नवल निकुंज में नवल जोरी श्री जुगल किशोर विराज रहे हैं। श्री श्यामसुंदर के अंग-प्रत्यंग रस से भरे प्रतीत हो रहे हैं एवं नवल किशोरी श्री श्यामा जू की अंग कांति विद्युत वर्ण है।

  10. काहू की आस न त्रास करै - श्री सरस देव जु, श्री सरस देव जु की वाणी, सिद्धांत के पद (14)

    नित्य विहार के उपासक ना तो किसी आशा में बंधते हैं, ना ही किसी परिस्थिति का भय उन्हें डिगा पाता है। उनका मन दृढ़ता और निश्चय में स्थिर रहता है।

  11. श्री बिहारी प्यारी पर हौं वारी - श्री सरस देव जी, श्री सरस देव जू की बानी

    श्री बिहारी जी की प्यारी श्री राधा पर बार बार बलिहारी है जो सदा ही प्रसन्न रहती हैं, अत्यंत सुन्दर हैं, और नित्य ही समस्त सुखों एवं रस को देने वाली हैं।