प्यारी प्रीतम सों लिख्यौं, मत परियौ मौ ध्यान - श्री दयाराम जी
प्यारीजू अपने प्रियतम को लिखती हैं कि तुम मेरा ध्यान न करना अन्यथा तुम भी मेरे जैसे हो जाओगे। फिर मैं मान किस पर करूँगी?
श्री दयाराम 18वीं सदी के एक रसिक कवि थे। उनकी रचनाओं को साहित्यिक और आध्यात्मिक महत्व की दृष्टि से बहुत उच्च माना जाता था ।
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प्यारीजू अपने प्रियतम को लिखती हैं कि तुम मेरा ध्यान न करना अन्यथा तुम भी मेरे जैसे हो जाओगे। फिर मैं मान किस पर करूँगी?
जब दिव्य प्रेम का तीव्र और असह्य बाण हृदय में लग जाता है, तब लोक-लाज, कुल-मर्यादा, वेद-शास्त्र, और विवेक का बल जैसी सारी सीमाएँ टूट जाती हैं।
जिस प्रकार तलवार तानकर खड़े शूरवीर के चित्र में तलवार सदैव तनी ही रहती है और म्यान में वापस नहीं जाती, उसी प्रकार का प्रेम नंदलाल के प्रति होना चाहिए कि एक बार प्रकट होने पर पुनः कम न होने पावे।
हे सखि श्याम श्यामा का और श्यामा श्याम का नाम रटा करते थे, पर आज बड़ा अचंभा देखा, दोनों अपने-अपने नाम रट रहे थे।
हे ब्रजराज! आप दीनबंधु हैं तो क्या मैं दीन नहीं हूँ, आप अधमों का उद्धार करने वाले हैं तो क्या मैं अधम नहीं हूँ, आप ग़रीबनिवाज़ हैं, तो क्या मैं ग़रीब नहीं हूँ। इन सब में से क्या मैं कुछ भी नहीं हूँ जो आप अब तक मेरी सुध नहीं लेते!
श्री कृष्ण पीतांबर धारण करते हैं और श्री राधा नीलांबर धारण करती हैं । इसका हारद तोल (हार्दिक भाव का रहस्य मर्म) यह है कि ऐसा करने से दोनों को एक दूसरे के अंग रंग के संग होने की प्रतीति होती है।
परम वैष्णवों और संतों की यही विलक्षण पद्धति है कि वे दूसरों के दोषों को ढक लेते हैं और केवल गुणों को ही प्रकाशित करते हैं। ठीक वैसे ही, जैसे महादेव ने क्षीर-सागर के मंथन से प्राप्त हलाहल विष को स्वयं पी लिया, किंतु उज्ज्वल चंद्रमा को अपने मस्तक का आभूषण बनाया।
रसिकों के नयन-बाणों की अनोखी रीत है, वे दुश्मन का तो स्पर्श तक नहीं करते और अपने मीत को ही मारते हैं।
यद्यपि ब्रज की गोपिकाएँ योग, यज्ञ, जप, तप, तीर्थ, ज्ञान, धर्म, व्रत और नियम आदि में प्रवृत्त नहीं थीं, फिर भी श्रीकृष्ण ने उन्हें केवल उनके निष्काम और अनन्य प्रेम के पर बल ही अपना सर्वाधिक प्रिय स्वीकार किया था।