श्री दयाराम

श्री दयाराम 18वीं सदी के एक रसिक कवि थे। उनकी रचनाओं को साहित्यिक और आध्यात्मिक महत्व की दृष्टि से बहुत उच्च माना जाता था ।

9 लेख उपलब्ध हैं

  1. सोइ नेह नदलाल में प्रकटि न पावें जान- श्री दयाराम जी

    जिस प्रकार तलवार तानकर खड़े शूरवीर के चित्र में तलवार सदैव तनी ही रहती है और म्यान में वापस नहीं जाती, उसी प्रकार का प्रेम नंदलाल के प्रति होना चाहिए कि एक बार प्रकट होने पर पुनः कम न होने पावे।

  2. दीनबंधु अधमुद्धरन, नाम ग़रीब निवाज़ - श्री दयाराम जी

    हे ब्रजराज! आप दीनबंधु हैं तो क्या मैं दीन नहीं हूँ, आप अधमों का उद्धार करने वाले हैं तो क्या मैं अधम नहीं हूँ, आप ग़रीबनिवाज़ हैं, तो क्या मैं ग़रीब नहीं हूँ। इन सब में से क्या मैं कुछ भी नहीं हूँ जो आप अब तक मेरी सुध नहीं लेते!

  3. पीतांबर परिधान प्रभु राधा नील निचोल - श्री दयाराम जी

    श्री कृष्ण पीतांबर धारण करते हैं और श्री राधा नीलांबर धारण करती हैं । इसका हारद तोल (हार्दिक भाव का रहस्य मर्म) यह है कि ऐसा करने से दोनों को एक दूसरे के अंग रंग के संग होने की प्रतीति होती है।

  4. ढपें दोष गुन फुट करें पर हरिजन यह चाल - श्री दयाराम जी

    परम वैष्णवों और संतों की यही विलक्षण पद्धति है कि वे दूसरों के दोषों को ढक लेते हैं और केवल गुणों को ही प्रकाशित करते हैं। ठीक वैसे ही, जैसे महादेव ने क्षीर-सागर के मंथन से प्राप्त हलाहल विष को स्वयं पी लिया, किंतु उज्ज्वल चंद्रमा को अपने मस्तक का आभूषण बनाया।

  5. योग यज्ञ जप तप तिरिथ - श्री दयाराम जी

    यद्यपि ब्रज की गोपिकाएँ योग, यज्ञ, जप, तप, तीर्थ, ज्ञान, धर्म, व्रत और नियम आदि में प्रवृत्त नहीं थीं, फिर भी श्रीकृष्ण ने उन्हें केवल उनके निष्काम और अनन्य प्रेम के पर बल ही अपना सर्वाधिक प्रिय स्वीकार किया था।