श्री कल्याण पुजारी

श्री कल्याण पुजारी का जन्म 1543 में हुआ था । ये सनाढ्य ब्राह्मण थे । राधावल्लभ संप्रदाय के गोस्वामी श्री वनचन्द्र जी ने इन्हें दीक्षा प्रदान की थी । ये रसिकों का 'सीथ' प्रसाद खाने में प्रसन्न रहते थे।राधावल्लभ जी के मन्दिर की सेवा-पूजा का कार्य इन्हें प्राप्त था, इसीलिये ये पुजारी उपाधि से प्रसिद्ध हुए । श्री कल्याण पुजारी रसिक संतों को भोजन करा कर उनका प्रसाद स्वयं खा लिया करते थे, इसलिये अन्य बहुत से लोग इनसे अप्रसन्न रहते थे और इन्हें हीन दृष्टि से देखते थे । उन्होंने गोस्वामी जी से इनके इस कार्य कि शिकायत भी की । कल्याण पुजारी को जब यह ज्ञात हुआ तो उन्होंने स्वयं ही सेवा का अधिकार छोड़ दिया । उसी रात को गोस्वामी जी को श्रीजी का दर्शन हुआ और उन्होंने कहा कि कल्याण पुजारी के हाथ का ही भोग हमें लगना चाहिये । पुनः प्रातःकाल कल्याण पुजारी को बुला कर सेवा उन्हें यथावत् सौंप दी गई ।

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  1. या छवि ऊपर हौं बलिहारी - श्री कल्याण पुजारी जी, श्री हित कल्याण पुजारी जी की वाणी (73)

    मैं दिव्य दंपति श्री राधा कृष्ण की उस छवि पर बलिहार जाता हूँ जब वे दोनों एक दूसरे का आलिंगन कर गले में हाथ डाले सुशोभित होते हैं ।

  2. श्री कल्याण पुजारी जी की जीवनी

    कल्याण पुजारी जी दृढ व्रत धारण करनेवाले भक्त हैं जो नवल किशोर श्री श्यामाश्याम के अनन्य रस-उपासक हैं । इनके मुख से मधुर वाणी निकलती थी जो सबके मन का हरण कर लेती थी एवं सुख देनेवाली थी ।

  3. प्रभु तुम्हरी कृपा अपार है, मेरेहु दोष अपार - श्री कल्याण पुजारी जी की वाणी (236)

    हे प्रभु! आपकी कृपा की कोई सीमा नहीं है, वह अनंत और अपार है, परंतु दूसरी ओर मेरे अपराध और दोष भी अनगिनत हैं। इस प्रकार हम और आप एक-दूसरे के समतुल्य हैं। अब आप ही विचार कीजिए कि मेरे दोषों का निवारण कैसे होगा, जिससे मैं आपकी कृपा को प्राप्त कर सकूँ।