श्रृंगार रस - द्वितीय खंड [बयालीस लीला]
श्री राधा कृष्ण के श्रृंगार रस को समर्पित पदों एवं कवित्त को तीन भागों में बाँटा गया है जो श्री हित ध्रुवदास जी द्वारा लिखित 'बयालीस लीला' नामक ग्रंथ का भाग है।
9 लेख उपलब्ध हैं
फूलि चले दोउ फूलनि कुंज ते - श्री ध्रुवदास, ब्यालीस लीला, श्रृंगार शत (2.37)
फूलों की कुञ्ज से निकल कर प्रसन्न मन युगल-किशोर श्रीवन की पुष्प लताओं की शोभा को देखते हुए चले आ रहे हैं। वे ऐसे प्रतीत हो रहे हैं, मानो छबि के युगल चन्द्रमा आनन्दोल्लास में भरे मधुर स्वरों में गान कर रहे हों।
प्रीतम किसोरी गोरी रसिक रँगीली जोरी - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रृंगार शत 2 (16)
गौरांगी नवल किशोरी एवं नीलघन सुंदर प्रियतम युगल की प्रेम रंग में सराबोर रसिक रँगीली जोड़ी की शोभा का भी कोई वर्णन हो सकता है? अर्थात् नहीं। उनकी शोभा अनिर्वचनीय है।
माधुरी की कुंज तामैं मोद की लै सेज रची - श्री ध्रुवदास जी, बयालीस लीला, श्रृंगार शत 2 (24)
समस्त ब्रह्मांड की मधुरता को लिए कुंज भवन है, जिसमें स्वयं आनंद ही शय्या की प्रकट रचना है, और उस पर विराजमान अलबेले श्री सुकुमारी-सुकुमार जी सुशोभित हैं।
छुवत न रसिक रँगीलौ लाल प्यारी जूको - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रृंगार शत 2 (43)
रसिक रंगीले प्रियतम श्री कृष्ण श्री प्यारी जू के कोमल अंगों का स्पर्श तन से तो क्या, मन के हाथों से भी करने की कल्पना नहीं कर पाते हैं।
प्यारे जू की जीवनि है नवल किशोरी गोरी - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रृंगार शत 2 (4)
नित्य किशोरी श्री राधा, श्री कृष्ण की प्राण, जीवन, और धन हैं, और इसी प्रकार श्री कृष्ण भी श्री राधा के प्राण, जीवन, और धन हैं।
नवल रसिक पिय एक मन एक हीय - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रृंगार शत 2 (40)
नित्य नवीन रसिक प्रिया-प्रियतम अद्वय युगल हैं। उनके तन-मन एक हैं और दोनों की रुचियां एवं प्रियता भी सदैव एक ही रहती है।
छिन छिन नई छबि पानिप रही है फबि - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रृंगार शत 2 (30)
जिनके रूप में प्रतिक्षण छवि और लावण्य का नव-नव विकास होता रहता है, ऐसे श्री राधिकावल्लभ पर बरबस प्राण न्यौछावर हो जाते हैं।
जहाँ-जहाँ राधा प्यारी धरति चरन पिय - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रृंगार शत 2 (28)
श्री वृन्दावन की रसमयी भूमि में जहाँ-जहाँ प्रिया श्री राधा अपने सुकोमल चरणों को स्थापित करती हैं, वहीं-वहीं अनुरागी रसिक प्रियतम नेत्रों के पाँवड़े बिछाते चलते हैं।
जहाँ जहाँ राधा प्यारी धरति चरन पिय - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रिंगार शत द्वितीय खंड (28)
जहाँ जहाँ राधा प्यारी अपने सुकोमल चरणों को स्थापित करती चलती हैं, वहां वहां रसिक प्रियतम श्री कृष्ण अपनी आँखों की पलके बिछाते रहते है।