फूलि चले दोउ फूलनि कुंज ते - श्री ध्रुवदास, ब्यालीस लीला, श्रृंगार शत (2.37)
फूलों की कुञ्ज से निकल कर प्रसन्न मन युगल-किशोर श्रीवन की पुष्प लताओं की शोभा को देखते हुए चले आ रहे हैं। वे ऐसे प्रतीत हो रहे हैं, मानो छबि के युगल चन्द्रमा आनन्दोल्लास में भरे मधुर स्वरों में गान कर रहे हों।
