नरोत्तम दास

नरोत्तम दास ठाकुर जिसे ठाकुर महाशय के नाम से भी जाना जाता है, एक गौड़ीय वैष्णव संत थे, जो पहले बंगाल में रहे और बाद में वृंदावन में स्थानांतरित हो गए जिन्हें लोकनाथ गोस्वामी द्वारा दीक्षा दी गई।

8 लेख उपलब्ध हैं

  1. युगल चरण सेवा, युगल चरण ध्येवा - श्री नरोत्तम दास, प्रेम भक्ति चंद्रिका (43)

    श्री युगल किशोर की चरण सेवा, युगल चरणों का ध्यान, युगल किशोर की काम रति के समान रूप माधुर्य, एवं उनकी दिव्य लीलाएँ, बस यही मेरे मन में स्मृति बनी रहे ।

  2. नरोत्तमदासे कय, एइ जेन मोर हये - श्री नरोत्तम दास, प्रेम भक्ति चंद्रिका (57)

    श्री नरोत्तम दास कहते हैं - मैं बस यही कहता हूँ कि व्रज में मेरा अनुरागमय वास हो। सखीगण की दासी होने के नाते श्रीप्रिया प्रीतम भी मुझे अपनी दासी मान लें तभी मेरी मनोभिलाष पूर्ण होगी ।

  3. गोविन्द शरीर सत्य ताहार सेवक नित्य - श्री नरोत्तम दास, प्रेम भक्ति चंद्रिका (66)

    श्रीगोविन्द का श्रीविग्रह नित्य है एवं उनके सेवक भी नित्य है। श्रीवृन्दावन भूमि अलौकिक तेजोमय है। त्रिभुवन में श्रीवृन्दावन के समान शोभा का सार स्थान और कोई नहीं है। इसका स्मरण करने मात्र से श्रीयुगल (श्री राधा कृष्ण) प्रेम आविर्भूत हो उठता है ।

  4. तार भक्तसंगे सदा - श्री नरोत्तम दास, प्रेम भक्ति चंद्रिका (109)

    श्रीराधिका के भक्तों का जो सदा संग करता है, मधुररस लीला की प्रेममयी कथा का जो श्रवण करता है, वह निश्चय ही श्रीघनश्याम को प्राप्त करता है। जो श्रीराधा से विमुख है, उसे तो कभी भजन में सिद्धि नहीं प्राप्त हो सकती, वह प्रेम-भक्ति को कभी प्राप्त नहीं कर सकता। उस व्यक्ति का तो नाम भी नहीं सुनना चाहिए।

  5. मनेर स्मरण प्राण - श्री नरोत्तम दास, प्रेम भक्ति चंद्रिका (61)

    मन से स्मरण करना ही प्राण है । अत: मधुराति मधुर रस धाम श्री युगल विलास का स्मरण करना चाहिए क्यूँकि यही सर्व श्रुतियों का सार है । इनका स्मरण करना ही साधन एवं साध्य है, इन्हें छोड़कर अन्य कोई साधन साध्य नहीं है और समस्त उपासनाओं का सार भी युगल विलास का स्मरण ही है ।

  6. राधिका-चरणरेणु, भूषण करिया तनु - श्री नरोत्तम दास, प्रेम भक्ति चंद्रिका (107)

    हे भाई! श्रीराधिका की चरणरेणु को तू अपने शरीर का भूषण कर, तब तो बिना किसी श्रम के तुम्हें श्रीकृष्ण गिरिधारी मिल जायेंगे। जो व्यक्ति श्रीराधा-चरण का आश्रय ग्रहण करता है, वास्तव में वही महत्-पुरुष है, में उस पर बलिहारी जाता हूँ।

  7. जय जय राधा-नाम, वृन्दावन जार धाम - श्री नरोत्तम दास, प्रेम भक्ति चंद्रिका (108)

    श्रीश्रीराधानाम की जय हो, जय हो। यह श्रीराधानाम वृन्दावन-विलासी श्रीकृष्ण के सुखविलास की निधि है। यदि श्रीराधानाम-गुणगान मैंने अपने कानों से नहीं सुना, तो मुझे तो विधाता ने अभी वञ्चित [जीवन व्यर्थ] कर रखा है।

  8. पृथक आवास योग, दुखमय विषय भोग - श्री नरोत्तम दास, प्रेम भक्ति चंद्रिका (31)

    व्रजमण्डल को छोड़कर जो अन्यत्र वास है, वह विषय भोग की तरह दुखमय है। व्रजवास तो श्रीगोविन्द-सेवन ही है, क्योंकि व्रजवासियों के साथ प्रतिक्षण श्रीकृष्णकथा एवं श्रीकृष्णनाम का स्मरण होता है, जो वास्तव में सच्चा रस-भण्डार है।