श्री ठाकुर

श्री ठाकुर, ब्रज के कवि।

8 लेख उपलब्ध हैं

  1. यह प्रेम कथा कहिये किहि - श्री ठाकुर जी

    हृदय की इस गम्भीर प्रेम-व्यथा को किसे कहें, क्योंकि यदि किसी से कहें भी तो कोई इसका विश्वास नहीं करता। सब केवल ऊपर-ऊपर से सांत्वना देना चाहते हैं, परन्तु भीतर लगे इस प्रेम-रोग को कोई पहचान नहीं पाता।

  2. वह कंज सो कोमल - श्री ठाकुर जी

    एक सखी श्री राधा से परिहास अथवा मनुहार करते हुए कहती है— हे सखी! तुम यह भली-भांति जानती हो कि गोपाल (श्री कृष्ण) के अंग कमल के समान अत्यंत कोमल हैं। मैं तुम्हारे बलैया लेती हूँ, तुम इतना नहीं पहचानती कि तुम्हारी केवल तनिक सी बेरुखी (मान) से श्री कृष्ण मुरझा जाते हैं?

  3. अब का समुझावती को समुझै - श्री ठाकुर जी

    एक सखी दूसरी से कहती है — अब तू क्या समझाएगी और कौन तुझे समझेगा? बदनामी का बीज तो तू पहले ही बो चुकी है। अब इतना सोच-विचार करने से क्या लाभ? जब स्वयं ही इस प्रेम-जाल में फँस गई है, तो अब दोष किसे देगी?

  4. कानन दूसरो नाम सुनै नहिं, एकहि रंग रँगो यह डोरो - श्री ठाकुर जी

    एक भक्त ठाकुर श्री बाँके बिहारी के प्रति अनन्यता प्रकट करता हुआ कहता है कि मेरे कानों ने अन्य नाम सुनने से माना कर दिया है, और मेरा हृदय तो अब बस बाँके बिहारी के रंग में ही रंगा हुआ उन्मत्त होकर डोल रहा है।