यह प्रेम कथा कहिये किहि - श्री ठाकुर जी
हृदय की इस गम्भीर प्रेम-व्यथा को किसे कहें, क्योंकि यदि किसी से कहें भी तो कोई इसका विश्वास नहीं करता। सब केवल ऊपर-ऊपर से सांत्वना देना चाहते हैं, परन्तु भीतर लगे इस प्रेम-रोग को कोई पहचान नहीं पाता।
श्री ठाकुर, ब्रज के कवि।
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हृदय की इस गम्भीर प्रेम-व्यथा को किसे कहें, क्योंकि यदि किसी से कहें भी तो कोई इसका विश्वास नहीं करता। सब केवल ऊपर-ऊपर से सांत्वना देना चाहते हैं, परन्तु भीतर लगे इस प्रेम-रोग को कोई पहचान नहीं पाता।
एक सखी श्री राधा से परिहास अथवा मनुहार करते हुए कहती है— हे सखी! तुम यह भली-भांति जानती हो कि गोपाल (श्री कृष्ण) के अंग कमल के समान अत्यंत कोमल हैं। मैं तुम्हारे बलैया लेती हूँ, तुम इतना नहीं पहचानती कि तुम्हारी केवल तनिक सी बेरुखी (मान) से श्री कृष्ण मुरझा जाते हैं?
एक सखी दूसरी से कहती है — अब तू क्या समझाएगी और कौन तुझे समझेगा? बदनामी का बीज तो तू पहले ही बो चुकी है। अब इतना सोच-विचार करने से क्या लाभ? जब स्वयं ही इस प्रेम-जाल में फँस गई है, तो अब दोष किसे देगी?
कमल की कोमलता, गुलाब की सुगंध और चंद्रमा की शीतल आभा को लेकर, हे श्रीराधा, तुम्हारा अनुपम रूप साकार हुआ है।
जब से श्री कृष्ण की मोहिनी मूरत का दर्शन हुआ है, तब से उनकी वह छवि मेरी आँखों में बस गई है।
एक भक्त ठाकुर श्री बाँके बिहारी के प्रति अनन्यता प्रकट करता हुआ कहता है कि मेरे कानों ने अन्य नाम सुनने से माना कर दिया है, और मेरा हृदय तो अब बस बाँके बिहारी के रंग में ही रंगा हुआ उन्मत्त होकर डोल रहा है।
हे मनमोहन [श्री बाँके बिहारी], यदि आप प्रतिदिन न आ सकें तो कृपा कर हमारी विनती सुनें।
हे श्री राधे, आप कमल के फूल से अधिक कोमल और गुलाब से अधिक सुगंधित हैं। आप चंद्रमा से अधिक तेजस्वी और सूर्योदय के प्रकाश के समान हैं।