16 शब्दकोश लेख उपलब्ध हैं

  1. कैंधो रसखान रस कोस - श्री रसखान, रसखान रत्नावली

    श्री राधा के अद्भुत सौन्दर्य का वर्णन करते हुए रसखान कहते हैं कि विधाता ने संसार को प्यासा जानकर उसकी पूर्ण तृप्ति के लिए तुम्हारे नेत्रों में आनन्द की अखण्ड निधि भर दी है।

  2. मैं तो गोवर्धन को जाऊँ मेरी वीर - श्री चन्द्रसखी जी

    हे सखी, मैं गोवर्धन जाऊँगी, क्योंकि मेरा चंचल हृदय और कहीं शांति नहीं पाता। मैं प्रेमपूर्वक प्रचुर मात्रा में भोजन बनाकर भोग लगाऊँगी, संतों को आमंत्रित कर उन्हें प्रेम से पवाऊँगी, क्योंकि इसके बिना मेरा हृदय मानता नहीं।

  3. स्याम भये बस नागरि कैं - श्री सूरदास, सूर सागर

    श्री कृष्ण नागरि (श्री राधा) के वशीभूत हो गये हैं। वे उन घोष (गोपालक) कुल को उजागर करने वाली श्री राधा के नेत्र-कटाक्ष और उनकी टेड़ी चितवन पर रीझे हुए हैं।

  4. बाद ग्राम, मथुरा - श्री हित हरिवंश महाप्रभु का प्राकट्य स्थल

    मथुरा में स्थित बाद ग्राम राधावल्लभ संप्रदाय प्रवर्तक श्री हित हरिवंश महाप्रभु की जन्म भूमि है। इसलिए यह स्थान राधावल्लभ सम्प्रदायानुगत वैष्णवों के लिए एक तीर्थ स्थान है।

  5. श्रीराधेरानी, तोहि सों लागत मैं नीको - श्री माधुरी अलि जी

    श्रीकृष्ण कहते हैं, श्री राधारानी, मेरा सौंदर्य केवल आपकी उपस्थिति के कारण है। जैसे सर्प अपने मणि के बिना अपनी शोभा खो देता है, मंदिर दीपक के बिना मंद पड़ जाता है, और फूल सुगंध के बिना अपना महत्व खो देता है, वैसे ही आपके बिना मेरा अस्तित्व तुच्छ है।

  6. राधे तेरे रूप की पटतर कहिये काहि - श्री भट्ट देवाचार्य, युगल शतक (65)

    हे श्रीराधे! आपके अनुपम रूप की उपमा भला किससे दी जा सकती है? आपके नयनों के कोर के कटाक्षों के वशीभूत होकर श्रीश्यामसुंदर अपना सर्वस्व न्योछावर कर पूर्णतः आपके ही होकर रह गए हैं।

  7. श्री हित वृन्दावन दास जी (चाचा जी) की जीवनी

    ब्रज रस भक्ति धारा की रस वारिधी को और अधिक प्रखर करने में चाचा श्री हित वृंदावन दास जी का बहुत महत्वपूर्ण योगदान है। चाचा श्री हित वृंदावन दास जी का जन्म 1694 में श्याम सुंदर की क्रीडा स्थली ब्रजधाम के किसी ग्रामाँंचल में गौड़-ब्राम्हण कुल में हुआ।

  8. ब्रज धाम और उसकी महिमा ? - कैसे पड़ा नाम 'ब्रज'?

    ब्रज धाम मुख्य रूप से वन संस्कृति है। जैसा कि स्कंद पुराण में उल्लेख किया गया है, पृथ्वी पर धूल के कण की गिनती करना संभव हो सकता है, लेकिन ब्रज में पवित्र स्थानों की संख्या को गिनना असंभव है। एक बार श्री कृष्ण स्वयं और राधारानी के अवतार के समय, श्री यमुना जी से धरती पर जाने का अनुरोध किया।