अदेयं चापि या दत्ते-दत्वा रक्षां करोति या - श्री वागीश शास्त्री जी, श्री राधा नाम सुधा (11)
श्री राधा अपने भक्त (नाम-आराधक) को अदेय वस्तु भी दे देती हैं और उस वस्तु की रक्षा भी करती हैं । राधा योगक्षेम करने वाली हैं, भक्तों को ऐसा अनुभव भी होता है ।
वृंदावन के रसिक निकुंज में श्री राधा को साक्षात गुरु स्वरूप में मानते ही मानते हैं । एक साधक को भी श्री राधा को ही अनन्य रूप से गुरु मानना चाहिए।
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श्री राधा अपने भक्त (नाम-आराधक) को अदेय वस्तु भी दे देती हैं और उस वस्तु की रक्षा भी करती हैं । राधा योगक्षेम करने वाली हैं, भक्तों को ऐसा अनुभव भी होता है ।
जिस जीव का राधा ही साध्य है और राधा ही साधन है। मंत्र भी राधा है और मंत्र देने वाली गुरुरूपा भी राधा है। राधा ही जिसका सर्वस्व है और राधा ही जिसका जीवन है। वाणी में भी जिसके राधा नाम है, ऐसे परम भाग्यशाली जीव के लिए कोई भी पुरुषार्थ शेष नहीं रहता ।
करोड़ों जन्म तक वांछा करने पर भी वृषभानु सुता श्री राधा जिसके ह्रदय में प्रकट हो जाय, वही मानुष धन्य है ।
श्री वृषभानु कुँवरी श्री राधा ही मेरे जीवन की प्राण हैं । मैं इस वृंदावन धाम की शपथ ग्रहण कर कहता हूँ कि उनके अतिरिक्त मेरे ह्रदय में अन्य कोई नहीं निवास करता ।
श्री राधा ही जिनकी इष्ट हैं, श्रीराधा ही जिनके सम्प्रदाय की एकमात्र प्रवर्तक आचार्य हैं, जिनकी मंत्रदाता सद्गुरू श्रीराधा ही हैं, जिनका मंत्र भी श्रीराधा ही है, श्रीराधा चरण-कमल-प्रधान उन श्रीहित हरिवंशचन्द्र महाप्रभु जी की मैं वन्दना करता हूँ ।
हमारी प्राण-प्यारी कुंज-बिहारिनी श्रीराधिका जू ने हमारे हृदय में सर्वोपरि प्रेम भरकर तन, मन एवं वचनों की समस्त अविद्याओं को दूर कर दिया है।
श्री राधा के निज महल की सखियाँ, श्री राधा के निज महल के रस में ऐसी उन्मत्त रहती हैं कि उनके (श्री राधा के) अतिरिक्त अन्य किसी को नहीं मानती । यह सखियाँ तो अलबेली (राधा जू) के नित्य ही संग में रहती हैं एवं उनके आभूषण, वस्त्र आदि की अंग सेवा करती रहती हैं ।
मेरी गुरु, माता, पिता केवल एक श्री लाडिली किशोरी श्री राधिका हैं, केवल इन्हीं का बल ही मेरे हृदय में हर क्षण समाया हुआ है ।
व्यासनंदन श्री हरिवंश जी ने श्री राधा को ही अपना गुरु बनाया, श्री “राधा राधा” नाम का ही मंत्र प्रेम पूर्वक जपा जिससे श्री राधा ने उन्हें दर्शन दिए।
श्री कृष्ण कहते हैं कि मैं उन श्री राधा की आराधना करता हूँ जो मधुरता में मधुर, महत्ता में गुरु और सुन्दरता में सुन्दर हैं ।
मेरी गुरु, माता, पिता केवल एक श्री लाडिली किशोरी श्री राधिका हैं, केवल इन्हीं का बल मेरे हृदय में हर क्षण विद्यमान है।
न तो हम किसी (देह मानी) के चेला है और नकिसी (देह मानी) के गुरु हम तो अपने प्रिया प्रियतम की भावमयी सखी है। हम सदा उनके रंगमहल में निवास करते है और निरंतर उनकी टहल किया करते है। प्रिया प्रियतम की भी यह दशा है कि उन्हें हमारे बिना एक पल में ही बेकली होने लगती है।
श्री राधा कृष्ण स्वरूपा हैं और कृष्ण श्रीराधा रूप हैं, मैं निकुञ्जस्थ गुरुरूपा श्रीराधा की शरण में जाता हूँ।
श्री भगवत रसिक जी भावमयी सखी भाव से कहते हैं कि हम श्यामा श्याम के शिष्य भी हैं और गुरु भी हैं (वे जैसी आज्ञा देते है, हम वैसा करते हैं और हम जैसा निर्देश देते है, वैसे वे रस विलसते हैं ) । प्रेम से ओत प्रोत होकर हमने उनको अपना सर्वस्व (मन, तन, धन, धाम) अर्पण कर दिया ।
जिस अधिकारी जीव का राधा ही साध्य है और राधा ही साधन है। मंत्र भी राधा है और मंत्र देने वाली गुरुरूपा भी राधा है। राधा ही जिसका सर्वस्व है और राधा ही जिसका जीवन है। वाणी में भी जिसके राधा नाम है, ऐसे जीव के लिए कोई भी पुरुषार्थ शेष नहीं रहता ।
श्रीभगवतरसिकजी भावमयी सखी-भाव से कहते हैं कि हम श्रीश्यामा-श्याम के शिष्य भी हैं और गुरु भी हैं। प्रेम से ओत-प्रोत होकर हमने अपना सर्वस्व (मन, तन, धन, धाम) उन्हें अर्पण कर दिया है।
श्री भगवत रसिक जी के शब्दों में वह न किसी के चेला हैं, और न गुरु हैं वह केवल निज महल में श्री लाड़ली लाल को दिन रात लाड लड़ाती हैं |
वृन्दावन के रसिक संत केवल श्री राधा की शरण में हैं।