श्री राधा ही सर्वोच्च गुरु हैं

वृंदावन के रसिक निकुंज में श्री राधा को साक्षात गुरु स्वरूप में मानते ही मानते हैं । एक साधक को भी श्री राधा को ही अनन्य रूप से गुरु मानना चाहिए।

18 लेख उपलब्ध हैं

  1. अदेयं चापि या दत्ते-दत्वा रक्षां करोति या - श्री वागीश शास्त्री जी, श्री राधा नाम सुधा (11)

    श्री राधा अपने भक्त (नाम-आराधक) को अदेय वस्तु भी दे देती हैं और उस वस्तु की रक्षा भी करती हैं । राधा योगक्षेम करने वाली हैं, भक्तों को ऐसा अनुभव भी होता है ।

  2. राधा साध्यं साधनं यस्य राधा मन्त्रो राधा मन्त्रदात्री च राधा - श्री वागीश शास्त्री जी, श्री राधा नाम सुधा (20)

    जिस जीव का राधा ही साध्य है और राधा ही साधन है। मंत्र भी राधा है और मंत्र देने वाली गुरुरूपा भी राधा है। राधा ही जिसका सर्वस्व है और राधा ही जिसका जीवन है। वाणी में भी जिसके राधा नाम है, ऐसे परम भाग्यशाली जीव के लिए कोई भी पुरुषार्थ शेष नहीं रहता ।

  3. कुंवर लली वृषभान की मेरे जीवन प्रान - श्री वंशी अलि, हृदय सर्वस्व (22)

    श्री वृषभानु कुँवरी श्री राधा ही मेरे जीवन की प्राण हैं । मैं इस वृंदावन धाम की शपथ ग्रहण कर कहता हूँ कि उनके अतिरिक्त मेरे ह्रदय में अन्य कोई नहीं निवास करता ।

  4. राधैवेष्‍ट: संप्रदायैक कर्ताचार्यो राधा - श्री हरिलालव्यास जी, रस कुल्य टीका, मंगलाचरण

    श्री राधा ही जिनकी इष्ट हैं, श्रीराधा ही जिनके सम्प्रदाय की एकमात्र प्रवर्तक आचार्य हैं, जिनकी मंत्रदाता सद्गुरू श्रीराधा ही हैं, जिनका मंत्र भी श्रीराधा ही है, श्रीराधा चरण-कमल-प्रधान उन श्रीहित हरिवंशचन्द्र महाप्रभु जी की मैं वन्दना करता हूँ ।

  5. तनु की मनु की बचन की करी अविद्या दूरि - श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (210)

    हमारी प्राण-प्यारी कुंज-बिहारिनी श्रीराधिका जू ने हमारे हृदय में सर्वोपरि प्रेम भरकर तन, मन एवं वचनों की समस्त अविद्याओं को दूर कर दिया है।

  6. महल मदन माती अली ये - श्री वल्लभ रसिक जी की वाणी

    श्री राधा के निज महल की सखियाँ, श्री राधा के निज महल के रस में ऐसी उन्मत्त रहती हैं कि उनके (श्री राधा के) अतिरिक्त अन्य किसी को नहीं मानती । यह सखियाँ तो अलबेली (राधा जू) के नित्य ही संग में रहती हैं एवं उनके आभूषण, वस्त्र आदि की अंग सेवा करती रहती हैं ।

  7. व्याससुवन हरिवंश जू गुरु श्री राधा कीन - श्री हित परमानंद दास जी

    व्यासनंदन श्री हरिवंश जी ने श्री राधा को ही अपना गुरु बनाया, श्री “राधा राधा” नाम का ही मंत्र प्रेम पूर्वक जपा जिससे श्री राधा ने उन्हें दर्शन दिए।

  8. माधुर्ये मधुरा राधा महत्त्वे राधिका गुरु - ब्रह्मांड पुराण, श्री राधास्तोत्रम् (5)

    श्री कृष्ण कहते हैं कि मैं उन श्री राधा की आराधना करता हूँ जो मधुरता में मधुर, महत्ता में गुरु और सुन्दरता में सुन्दर हैं ।

  9. मेरे गुरु मात पिता, लाड़ली किशोरी एक - श्री हित गोपाल दास [सेवा कुञ्ज वाले], निकुंज रस वल्लरी (47)

    मेरी गुरु, माता, पिता केवल एक श्री लाडिली किशोरी श्री राधिका हैं, केवल इन्हीं का बल मेरे हृदय में हर क्षण विद्यमान है।

  10. चेला काहू के नहीं - श्री भगवत रसिक,भगवत रसिक की वाणी, अनन्यनिश्चयात्म ग्रंथ, उत्तरार्ध (40)

    न तो हम किसी (देह मानी) के चेला है और नकिसी (देह मानी) के गुरु हम तो अपने प्रिया प्रियतम की भावमयी सखी है। हम सदा उनके रंगमहल में निवास करते है और निरंतर उनकी टहल किया करते है। प्रिया प्रियतम की भी यह दशा है कि उन्हें हमारे बिना एक पल में ही बेकली होने लगती है।

  11. राधाकृष्ण स्वरूपां वै कृष्ण राधास्वरूपिणम् - श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावाणी, सेवा सुख, मंगलाचरण (02)

    श्री राधा कृष्ण स्वरूपा हैं और कृष्ण श्रीराधा रूप हैं, मैं निकुञ्जस्थ गुरुरूपा श्रीराधा की शरण में जाता हूँ।

  12. हम सिष स्यामा स्याम के, गुरु हम स्यामा स्याम - श्री भगवत रसिक - भगवत रसिक की वाणी, अनन्यनिश्चयात्म ग्रन्थ - उत्तरार्ध (41)

    श्री भगवत रसिक जी भावमयी सखी भाव से कहते हैं कि हम श्यामा श्याम के शिष्य भी हैं और गुरु भी हैं (वे जैसी आज्ञा देते है, हम वैसा करते हैं और हम जैसा निर्देश देते है, वैसे वे रस विलसते हैं ) । प्रेम से ओत प्रोत होकर हमने उनको अपना सर्वस्व (मन, तन, धन, धाम) अर्पण कर दिया ।

  13. राधा साध्यं साधनं यस्य राधा मन्त्रो राधा मन्त्रदात्री च राधा - श्री वागीश शास्त्री जी, श्री राधा नाम सुधा (20)

    जिस अधिकारी जीव का राधा ही साध्य है और राधा ही साधन है। मंत्र भी राधा है और मंत्र देने वाली गुरुरूपा भी राधा है। राधा ही जिसका सर्वस्व है और राधा ही जिसका जीवन है। वाणी में भी जिसके राधा नाम है, ऐसे जीव के लिए कोई भी पुरुषार्थ शेष नहीं रहता ।

  14. हम सिष स्यामा स्याम के - श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [उतरार्द्ध] (41)

    श्रीभगवतरसिकजी भावमयी सखी-भाव से कहते हैं कि हम श्रीश्यामा-श्याम के शिष्य भी हैं और गुरु भी हैं। प्रेम से ओत-प्रोत होकर हमने अपना सर्वस्व (मन, तन, धन, धाम) उन्हें अर्पण कर दिया है।

  15. चेला काहू के नहीं, गुरु काहू के नहीं - श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [उतरार्द्ध] (40)

    श्री भगवत रसिक जी के शब्दों में वह न किसी के चेला हैं, और न गुरु हैं वह केवल निज महल में श्री लाड़ली लाल को दिन रात लाड लड़ाती हैं |