या छवि की उपमा को दीजै - श्री चन्द्रसखी जी
दिव्य दंपति श्री श्यामाश्याम की छवि की उपमा का वर्णन किस प्रकार किया जाये । वे दोनों रंग भरे आभूषण से सुसज्जित हैं जिनको निहार निहार कर आनंद रस का पान कीजिए ।
चंद्रसखी पदावाली श्री राधा वल्लभ संप्रदाय के रसिक भक्त श्री चंद्रसखी द्वारा लिखी अत्यंत सुंदर भक्तिपूर्ण काव्य रचना है। श्री चंद्रसखी की काव्य रचनाएँ बहुत प्रसिद्ध हैं जिन्हें ब्रज में विभिन्न अवसरों पर गाया जाता है।
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दिव्य दंपति श्री श्यामाश्याम की छवि की उपमा का वर्णन किस प्रकार किया जाये । वे दोनों रंग भरे आभूषण से सुसज्जित हैं जिनको निहार निहार कर आनंद रस का पान कीजिए ।
अरी सखी, चलो वृंदावन चलते हैं क्योंकि मोहन श्री कृष्ण ने वहाँ वेणु बजायी है । वेणु को सुनते ही ब्रह्मदिक मोहित हो उठे और वेदों को अब वे पढ़ नहीं पा रहे । वेणु को सुनते ही शिव शंकर भी मोहित हो गये जो अब ध्यान नहीं धारण कर पा रहे ।
ब्रज के मुकुटमणि नन्दनन्दन श्री कृष्ण पर मैं स्वयं को न्योंछावर करती हूँ । समस्त देवताओं में श्री कृष्ण बड़े हैं, जैसे तारों के मध्य चंद्र ।
हे श्री श्यामसुंदर, मेरी यह कामना है की मैं आपके चरणों की रज बनकर सदा उन्हीं से लिपटी रहूँ । आपके माथे पर मोर मुकुट विराजमान है, सुन्दर तिलक धारण है, सुन्दर गोल कपोल है,जो की मनहरण है ।
श्री श्याम सुंदर श्री प्रिया जी से प्रार्थना कर रहे हैं: हे राधा रानी, मेरी बांसुरी मुझे लौटा दो ना ? इस वंशी में मेरे प्राण बसे हैं जो अब चोरी हो गई है ।
अरी सखी देख कान्हा मुरली में राधे राधे गान कर रास रचा रहा है । इधर गोकुल नगरी है, उधर मथुरा, इन दोनों के बीच में रास रचा रहा है ।
हे श्रीराधा, मुझ पर भी एक कृपा की दृष्टि डालिए । कृपा अपनी दासी की इस प्रेम भरी आकांक्षा को पूर्ण कर दीजिए ।
हे सखी, मैं ब्रज की रज क्यूँ न बन गयी? यदि मैं ब्रज की रज होती तो गोकुल की डगर में पड़ी रहती और उड़ उड़ कर श्री श्याम सुंदर के शरीर से जा लगी रहती ।
श्री कृष्ण हाथ में दर्पण लिए श्री राधा से कहते हैं "हे श्यामा प्यारी, आपका मुख सुन्दर है की मेरा मुख?"
मैं प्रीतम प्यारी की बलिहारी जाती हूं जब दिव्य दम्पति श्री राधा कृष्ण श्री वृंदावन धाम में भुजाओं को मिलाए हुए नित्य ही केली करते हैं एवं सुख बरसाते हैं । [1]