गीता ओ भागौत कौ कान्त - श्री कान्त किशोर, कान्त रसिक जी की वाणी, दोहा (6)
श्री कान्त रसिक जी कहते हैं कि भले कोई श्री गीताजी और श्रीमद्भागवत महापुराण का कितना ही बड़ा उपदेश क्यों न दे, किन्तु यदि उनका हृदय पत्थर के समान कठोर है, तो वे रसोपासना के वास्तविक रहस्य को नहीं समझ सकते। इस अनन्य रसिकों के देश (नित्य वृन्दावन) में प्रवेश केवल प्रेममय हृदय वाले रसिक ही कर सकते हैं।
