श्री कांतकिशोर

श्री कांतकिशोर ब्रज के एक रसिक भक्त थे।

10 लेख उपलब्ध हैं

  1. गीता ओ भागौत कौ कान्त - श्री कान्त किशोर, कान्त रसिक जी की वाणी, दोहा (6)

    श्री कान्त रसिक जी कहते हैं कि भले कोई श्री गीताजी और श्रीमद्भागवत महापुराण का कितना ही बड़ा उपदेश क्यों न दे, किन्तु यदि उनका हृदय पत्थर के समान कठोर है, तो वे रसोपासना के वास्तविक रहस्य को नहीं समझ सकते। इस अनन्य रसिकों के देश (नित्य वृन्दावन) में प्रवेश केवल प्रेममय हृदय वाले रसिक ही कर सकते हैं।

  2. कान्त द्वैत अद्वैत नहि नहीं अशिष्ट-विशिष्ठ - श्री कान्त किशोर, कान्त रसिक जी की वाणी, दोहा (5)

    श्रीयुगल सरकार न तो द्वैत, अद्वैत, द्वैताद्वैत और न ही विशिष्टाद्वैत जैसे दार्शनिक मतों की सीमाओं में आबद्ध हैं। वे वेदों के समस्त तार्किक विवादों से परे, पूर्णतः स्वतंत्र और रसमय हैं। रसिकों के लिए तो केवल श्यामा-श्याम की यह परम-प्रिय जोड़ी ही एकमात्र उपास्य और आधार है।

  3. श्रीहरिदास सरन हौं आयौ - श्री कान्त किशोर, कान्त रसिक जी की वाणी (35)

    जब से मैं अनन्य नृपति स्वामी श्री हरिदास जी की शरण में आया हूँ, तब से संसार के सभी झूठे बंधन छूट गए हैं और मुझे परम उज्ज्वल रस की प्राप्ति हुई है।

  4. स्वारथ कौ संसार सब परमारथ कौ खोल - श्री कान्त किशोर, कान्त रसिक जी की वाणी, दोहा (7)

    सारा संसार अपने स्वार्थ सिद्ध करने में लगा हुआ है, और वास्तविक परमार्थ केवल दिखावा मात्र अथवा खोल (ऊपरी आवरण) रह गया है। लोग प्रेम और रस-रीति की बड़ी-बड़ी बातें तो करते हैं, परंतु उनके हृदय का भंडार भीतर से पूरी तरह खाली है।

  5. बंदौं श्रीहरिदास के चरन कमल चित लाइ - श्री कान्त किशोर, कान्त रसिक जी की वाणी, दोहा (19)

    मैं मन लगाकर स्वामी श्री हरिदास जी के चरण-कमलों का वंदन करता हूँ जिन्होंने अपने हृदय की रस-माधुरी अर्थात् प्रिया प्रियतम के नित्य विहार रस को प्रत्यक्ष रूप से प्रकट करके दिखाया है ।

  6. रस की नित नव उठत तरंग - श्री कान्त किशोर, कान्त रसिक जी की वाणी (41)

    श्री धाम वृन्दावन में नित्य ही प्रेमरस की नई-नई तरंगें उठती रहती हैं। वहाँ प्रिया-प्रियतम की जोड़ी हँसती-खिलती लताओं की भाँति झूमती रहती है, जिनके अंग प्रेम के पुष्पों से भरे हुए हैं।

  7. न काहू को निन्दनौ ना काहू की संस - श्री कान्त किशोर, कान्त रसिक जी की वाणी, दोहा (20)

    मैं न तो किसी की निन्दा करूँ, न ही किसी की चापलूसी करूँ। श्री कान्त रसिक कहते हैं कि मेरे हृदय के परम आभूषण रूपी हार एक मात्र स्वामी श्री हरिदास जू ही हैं।

  8. श्री स्वामी हरिदास के चरन कमल चित लाउ - श्री कान्त किशोर, कान्त रसिक जी की वाणी, दोहा (1)

    मैं अपने मन को श्रीस्वामी हरिदास जी के परम पावन चरणकमलों में लगाता हूँ। श्री कान्त रसिक कहते हैं कि प्रिया-प्रियतम की रस माधुरी का अवलोकन एवं अनुभव करने का इससे सुंदर कोई अन्य उपाय नहीं है।