मन्त्र सिरोमनि राधा नाम - श्री मोहनचन्द्र जी
समस्त मन्त्रों का शिरोमणि श्री राधा नाम है, जिसके उच्चारण से श्री वृन्दावन धाम के वास की प्राप्ति होती है।
श्री मोहनचंद जी श्री हित हरिवंश महाप्रभु के तीसरे सुपुत्र थे जिनकी शिक्षा-दीक्षा संस्कार पिताजी से हुआ था । यह विद्वान एवं सुगायक भी थे। आपकी रचनाओं में श्री कृष्णाष्टक एवं श्री राधाष्टक प्रसिद्ध है एवं राधावल्लभ संप्रदाय में नित्य पाठ्य है ।
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समस्त मन्त्रों का शिरोमणि श्री राधा नाम है, जिसके उच्चारण से श्री वृन्दावन धाम के वास की प्राप्ति होती है।
हे श्री राधे! इन 8 श्लोकों में आपके सदगुणों का गान स्वयं आपके प्रियतम श्री कृष्ण ने मधुर वाणी से किया है। वह सदैव आपके प्रेम में वर्द्धन करने के लिए आपके चरण कमलों की सेवा करते हैं। हे निकुञ्ज धाम वासिनी श्री राधिका जू, मैं आपको नमन करता हूँ।
आपके प्रेम में विह्वल श्री कृष्ण के विशाल वक्ष स्थल पर आप शयन करती हैं। आप श्री कृष्ण को अति विनम्रता पूर्वक अपनी सुमधुर वाणी से भाव प्रदान करतीं हैं।
हे श्री राधिका जू, आपका ह्रदय प्रेम से सुशोभित है, जिसके लोभ से सदैव श्री कृष्ण हर्षित रहते हैं। आप प्रेम की रीति में अति निपुण हैं और महारास क्रीड़ा में प्रेम वर्धन करनेवाली आचार्या हैं।
हे श्री राधिका जू, आपका सम्पूर्ण अंग वर्षा के बादलों की सुगंध का जो सार है, उसके भी सार से सुवासित है। आपके भाल पर नील वर्ण की बिंदी सुशोभित है और आपकी नासिका अरुण (लाल) वर्ण से विभूषित है।
जो भी व्रज के राजकुमार श्री कृष्ण को अपशब्द कहता है उसके लिए आप काल का रूप धारण कर लेती हैं। आप श्री कृष्ण की बांसुरी चुरा लेती हैं, जिसके गीत और तान उन्हें मुग्ध करती हैं।
आपका अंग वह रत्न है जिसकी आभा समस्त व्रज मंडल को मोहित किये हुए है, जिसे श्री कृष्ण गुप्त रूप से अपने पास रखते हैं। आपका मुख कमल पूर्ण चन्द्रमा की भांति प्रकाशमान है
आपकी प्रत्येक आँखें प्रेम रूप की पूर्णता से चंचल हैं। आपका ह्रदय सदैव नंदनंदन श्री कृष्ण संग के प्रेम के रंग से रंगा हुआ है। आप अति प्रवीणता से अपने समस्त सखी समूह पर शासन करतीं हैं।
हे श्री राधिका जू, आपने गिरिराज पर्वत को धारण कर श्री कृष्ण को उसकी छाया में रखा। आपकी भृकुटि की चंचलता श्री कृष्ण के हृदय की तृष्णा का हरण कर लेती है। आपकी मधुर मन्द मुस्कान श्री कृष्ण के आनंद में वृद्धि करती है।
हे श्री राधिका, आप अति सुन्दर चमेली के पुष्प समान हैं, जिस पर गोकुल के स्वामी श्री कृष्ण की आँखें (भृंग के समान मत्त) टिकी हैं ।