श्री नेह नागरीदास

श्री नेह नागरीदास, श्री हिता हरिवंश महाप्रभु के शिष्य हैं, जो वृंदावन धाम के रसिक संत हैं।

10 लेख उपलब्ध हैं

  1. भजन भजन सव कोऊ कहै - श्री नेह नागरीदास जी की वाणी, दोहावली (29)

    कहने को तो सभी मुख से भजन और भक्ति की बातें करते हैं, लेकिन वास्तव में भक्ति मार्ग पर चलना बहुत कठिन होता है। जब इन्द्रियाँ, शरीर और सांसारिक गुण पूरी तरह टूटकर भक्ति में विलीन हो जाते हैं, तभी सच्चा भजन होता है।

  2. भजनी क्यों डरिहै उपहासहि - श्री नेह नागरी दास जी की वाणी

    भजन करने वाला व्यक्ति संसार के उपहास या आलोचना से क्यों डरे? वह तो अपनी वस्तु (भगवत्प्रेम/भगवद्प्राप्ति) के लिए सब सहता है। इसलिए यदि उसे लोकनिंदा और त्रास सहना भी पड़े, तो वह चिंता नहीं करता और अपने लक्ष्य की ओर बढ़ता रहता है।

  3. श्री हरिवंश सरन जे आये - श्री नेह नागरी दास जी की वाणी, सिद्धांत (136)

    जो भी जीव श्रीहरिवंश महाप्रभु जी की शरण में आ गए, उनका नाम स्वयं श्री राधा-श्यामसुन्दर ने अपने हस्तकमल से भक्तों की सूची में अंकित कर लिया।

  4. मूरत नैंनन में रमै - श्री नेह नागरीदास जी की वाणी, दोहावली (23)

    प्रियतम का स्वरूप नेत्रों में सदा बसा रहता है, और हृदय उसके गुणों से भरा रहता है। ऐसे प्रेमी की अवस्था को बाहरी दृष्टि से कोई समझ नहीं जा सकता, प्रेम की गहराई समझ से बहुत परे होती है ।

  5. जब लग सहज न बदलई, फुरै न जहाँ-तहाँ भाव - श्री नेह नागरीदास जी की वाणी, दोहावली (1)

    जब तक स्वभाव नहीं बदलता एवं ह्रदय में भाव स्थिर नहीं हो जाता तब तक प्रेम पंथ का पाना कठिन है । बनावट करने से कोई कार्य सिद्ध नहीं होता ।

  6. यह मन मारि जिवाईये, जियत न आवै काज - श्री नेह नागरी दास जी की वाणी, दोहावली (42)

    रसिकों द्वारा प्रतिपादित भगवत् प्रेम के मार्ग का अनुसरण करने के लिए पहले इस मन को मारकर फिर उसे दोबारा जीवित करना होता है, तभी इस मार्ग में चला जा सकता है।

  7. नेह नागरी दास जी - ब्रज के रसिक संत

    नेह नागरीदास का जन्म सन. १५९० के लगभग मध्य प्रदेश के गोंडवाना क्षेत्रान्तर्गत बेरछा नामक गाँव के एक सम्पन्न पँवार क्षत्रिय परिवार में हुआ था।