एती कृपा स्वामिनि मन चाहै - श्री ललित विहारिणी जी
हे स्वामिनीजू (श्री राधा), मुझ पर इतनी कृपा कर दीजिए कि मेरे मन से समस्त विकार, जैसे परनिंदा, अभिमान, ईर्ष्या और भेद-भाव सदा के लिए समाप्त हो जाएं।
श्री ललित विहारिणि जी वृंदावन धाम के एक रसिक संत थे।
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हे स्वामिनीजू (श्री राधा), मुझ पर इतनी कृपा कर दीजिए कि मेरे मन से समस्त विकार, जैसे परनिंदा, अभिमान, ईर्ष्या और भेद-भाव सदा के लिए समाप्त हो जाएं।
हे घनश्याम, तुम्हारे बिना मैं रसहीन हो गई हूँ। यह प्रिय सावन ऋतु का आगमन हुआ है, परंतु तुम्हारे बिना इसे बिताना कठिन हो रहा है। तुमसे प्रेम करके मैं बहुत पछता रही हूँ और सबके सामने निन्दित हो चुकी हूँ।
श्री राधा रूप एवं सौंदर्य की सदा प्रवाहित होने वाली नदी के समान हैं। वे सुंदर, सुकोमल, स्वर्ण के समान कांति वाली गोरी हैं जो श्री कृष्ण की प्रियतमा तथा कीर्ति जी की पुत्री हैं। [1]
हे कृपालु श्री कृष्ण, अपनी अकारण कृपा के कुछ कणों की मुझ पर भी वर्षा कीजिये! मेरा मन मुर्ख सदा मिथ्या सुख की चाह में ही नित्य भटकता रहता है।
हे विधाता, तुम्हारी कृपा से मुझे ब्रजवासी बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है जिसके परिणाम स्वरूप मुझे श्री राधा कृष्ण के चरणों की परम पावन रज को सदा स्पर्श करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है जिसकी याचना सुर, सिद्ध, मुनि एवं महालक्ष्मी आदि भी करते हैं ।
जो जीव श्यामसुंदर के नयनों के कटाक्षों से घायल होता है, उसका हाल केवल उसका ह्रदय ही जानता है । उसकी दशा ऐसी होती है कि वह जीव किसी अन्य से अपने ह्रदय का हाल भी नहीं बता सकता (अर्थात् ऐसे गुप्त प्रेम को वह किसी के सामने प्रकट नहीं कर सकता) ।
हे श्री श्यामा श्याम, अब देर न कीजिये, मुझे उबार लीजिये । बहिर्मुख होने के कारण मैं भवसागर में गोते खा रहा हूँ, केवल आपके ही सहारे से मैं इससे निकल पाउँगा ।
हे प्रिया प्रियतम! आप मेरे मन को कब ऐसा बनाएंगे कि मैं आपके निजमहल में प्रेमपूर्वक और निरंतर सेवा कर सकूं?
हे बांके बिहारी, जब से तुम्हारी छवि को निहारा है तब से कुछ ऐसी घटी जिस का पार पाना बड़ा मुश्किल है।
जब भी मेरा मन वृंदावन का स्मरण करता है तो मेरे हृदय के आकाश में वियोग की वेदना उत्पन्न हो जाती है और मेरी आंखों से अश्रुधार प्रवाहित होने लगते हैं ।
हे स्वामिनी जी [श्री राधा]! मेरे ऊपर इतनी कृपा करो कि मेरे हृदय से यह दोष जैसे परनिंदा, अभिमान, ईर्ष्या, भेद भावना इत्यदी सब समाप्त हो जाएँ ।
अब ऐसी कृपा की अद्बुत वर्षा कब होगी जब श्री वृंदावन का सुखदवास प्राप्त हो एवं श्री बाँके बिहारी की चितवन को निहारने का अवसर मिल जाए ।
श्री राधारानी के चरण बड़े अच्छे लगते हैं, जो बड़े ही सुन्दर, सरस एवं कमल के समान हैं और श्री श्यामसुंदर के ह्रदय-सरोवर में नित्य विराजमान हैं।
श्री ललित विहरिणि जी युगल से प्रार्थना कर कहते हैं कि हे रसिक शिरोमणि श्री श्याम सुंदर एवं रास रासेश्वरी भानु नंदिनी श्री राधिका जी ऐसी कृपा करो कि आप दोनों की सुंदर जोड़ी मेरे हृदय में भी बस जावे ।
एक सखी कहती है कि मैं सब संसार का त्याग कर वृंदावन में ही घर बनाऊँगी । यह जीवन तभी सुखी होगा जब नंदकुमार श्याम सुंदर मिलेंगे ।
जिस निकुंज वन की सघन कुंजों में श्री श्यामाश्याम सुख पूर्वक विहार करते हैं, उस वृंदावन की रज को मैं अपने आँखों की पलकों से झाड़ूंगा। [1]
जिस गली में प्रेम सदन है, उस गली में चलना अत्यंत कठिन है । या तो इस मार्ग को ब्रज चंद्र साँवरे लाल श्री कृष्ण जानते हैं या फिर सर्वोपरि नित्य बिहारिनि वृषभानु नंदिनी श्री राधिका जु जानती हैं । [1]