सुजान हित [श्री आनंदघन जी]

'सुजान हित' प्रियतम कृष्ण के प्रति दिव्य प्रेम से भरी एक प्रसिद्ध रचना है जो श्री आनंदघन जी द्वारा लिखित ग्रंथ घनानंद ग्रंथवाली का पहला अध्याय है जिसमें सेवैया, कवित्त आदि हैं।

9 लेख उपलब्ध हैं

  1. चातिक चुहल चहुँ ओर चाहै स्वाति - घनानंद ग्रंथावली, सुजान हित (187)

    विनोदी स्वभाव का चातक पक्षी संसार भर के जल को त्यागकर केवल स्वाति की बूंद ही चाहता है — वह अपने प्रण का ऐसा पालनकर्ता है कि अमृत भी उसके लिए विष बन जाता है।

  2. एक आस एकै बिसवास प्रान गहैं बास - घनानंद ग्रंथावली, सुजान हित (260)

    हे प्रियतम! तुमसे पुनः मिलने की एक मात्र आशा और विश्वास के सहारे ही मेरे ये प्राण (शरीर में) बचे हुए हैं, क्योंकि, इन्हें अब किसी दूसरे से पहचान नहीं रह गई है।

  3. कमला तप साधि अराधति है - श्री घनानंद जी, घनानंद ग्रंथावली, सुजान हित (467)

    श्री लक्ष्मी जी तप-साधना द्वारा श्री कृष्ण की आराधना करती हैं, मानो अभिलाषा रूपी महोदधि (समुद्र) में अवगाहन करने के लिए तपस्या कर रही हों।

  4. लगी है लगनि प्यारे पगी है सुरति तोसों - घनानंद जी, सुजान हित (242)

    हे प्रियतम श्यामसुंदर! तुम्हीं से मेरी लगन लगी हुई है (अर्थात् मैं तुमको ही प्रेम करती हूँ) और तुम्हीं में मेरी स्मृति पगी हुई है (तुम्हारा ही मैं ध्यान करती रहती हूँ), इसलिए (तुम्हारे अभाव में) मेरे हृदय में व्याकुलता जाग उठी है और (व्याकुलता के कारण) मैं खोई-खोई सी रहती हूँ।

  5. प्रीतम सुजान मेरे हित के निधान कहौ - श्री घनानंद जी

    हे मेरे प्रेम के आधार, मुझे सबसे अधिक प्रिय सुजान [श्याम सुंदर]! तुम ही बताओ, यदि तुम ही मुझसे रूठकर आलस्य दिखाओगे [मिलने से हिचकिचाओगे] तो फिर मेरे प्राण किस प्रकार रहेंगे?