विनय श्रृंगार शतक

विनय श्रृंगार शतक, श्री ललित किशोरीजी द्वारा रचित अभिलाष माधुरी ग्रंथ का प्रथम अध्याय है जिसमें 100 छंदों द्वारा विनय शृंगार रस का वर्णन किया गया है ।

10 लेख उपलब्ध हैं

  1. कीट पतंग पिपीलिका मरकट भृंग मयूर - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय श्रृंगार शतक (97)

    चाहे कीड़ा, पतंगा, चींटी, बन्दर, भौंरा या मोर—जो भी देह मिले, मुझे स्वीकार है। बस, हे युगल-बिहारी! मुझे वृन्दावन की धूल (तुम्हारी चरण-रज) बना दीजिए—वहीं का कण बनकर रहूँ।

  2. पशु पक्षी पाषाण हों - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय श्रृंगार शतक (91)

    हे ललित किशोरी (श्रीराधा)! कृपा कर मुझे ब्रज की गलियों में कुछ भी बना दें— चाहे पशु, पक्षी, पत्थर, तृण या ब्रजरज का एक धूलिकण ही क्यों न हो। चाहे कोई कुआं, बावड़ी या निर्जीव वस्तु ही क्यों न बना दो, बस एक ही विनती है — ब्रजधाम की रज को छोड़ कहीं और जन्म या वास न देना।

  3. जुगल बिहारी विरह में - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय श्रृंगार शतक (98)

    युगल विहार करने वाले श्री राधा-कृष्ण का वियोग अब और सहन नहीं होता। श्री ललित किशोरी कहते हैं कि हे किशोरीजी! कृपा कर अब मुझे वृन्दावन का वास प्रदान कीजिए ।

  4. मो मन कब अनुरागिहै - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय श्रृंगार शतक (120)

    जिस प्रकार एक प्यासा व्यक्ति निर्मल और शीतल जल की लालसा में व्याकुल हो उठता है, उसी प्रकार कब मेरे मन में भी दिव्य दंपति श्री राधा-कृष्ण के युगल चरणों के प्रति वैसा ही अनुराग और व्याकुलता उत्पन्न होगी?

  5. यही कर्म यही धर्म है, यही उपासन ज्ञान - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय श्रृंगार शतक (99)

    यही कर्म है, यही धर्म है, और यही उपासना का ज्ञान है कि या तो मैं इन नयनों से ब्रज रस का पान करूँ या मेरे प्राण निकल जाएँ। अर्थात्, इस मानव देह का क्या महत्व यदि ब्रज रस को प्राप्त ही ना किया?

  6. जुगल बिहारी दीजिए श्रीवृंदावन वास - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय श्रृंगार शतक (9)

    हे युगल बिहारी (श्री राधा कृष्ण), मुझे श्री वृंदावन का वास प्रदान कीजिए क्योंकि मेरे प्यासे नेत्र तुम्हारे रूप सुधा रस का पान करने के लिए मरे जा रहे हैं।

  7. ललितकिशोरी यह विनै - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय श्रृंगार शतक (92)

    हे ब्रज के सिरमौर श्री युगल किशोर, मैं आपसे यह विनती करता हूँ कि मैं सदैव श्री वृन्दावन में विचरण करूँगा एवं ब्रजवासियों से मधुकरी कर निर्वाह करूँगा।

  8. मोर कोर दृग देखिये, ललितकिशोरि पाँहिं - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय श्रृंगार शतक (94)

    हे ललित किशोरी श्री राधिका! अपनी करुणामयी कृपा-दृष्टि की कोर मुझ पर डालें और मुझे भी श्री वृंदावन धाम के किसी कोने में वास का सौभाग्य प्रदान करें।

  9. ललित किशोरी लालजू - श्री ललित किशोरी देव, अभिलाष माधुरी, श्रिंगार शतक (59)

    हे श्यामा-श्याम! मेरी यही विनती है कि चाहे मैं कूकर, शूकर अथवा किसी भी योनि में जन्म लूँ, परंतु मेरा नित्य वास श्री वृन्दावन धाम में ही हो।