व्रजलीला रस भावै अब तौ - श्री युगल प्रिया
अब तो मुझे ब्रज की दिव्य लीलाओं के अतिरिक्त और कुछ भी रुचिकर नहीं लगता। गिरिराज जी की पावन गोद में वास करना ही जीवन की परम सिद्धि प्रतीत होती है।
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अब तो मुझे ब्रज की दिव्य लीलाओं के अतिरिक्त और कुछ भी रुचिकर नहीं लगता। गिरिराज जी की पावन गोद में वास करना ही जीवन की परम सिद्धि प्रतीत होती है।
श्री धाम वृंदावन के वासी धन्य, धन्य हैं जो आठों पहर श्री राधा-कृष्ण की प्रेममयी भक्ति में मग्न रहते हैं।
कल्याण पुजारी जी दृढ व्रत धारण करनेवाले भक्त हैं जो नवल किशोर श्री श्यामाश्याम के अनन्य रस-उपासक हैं । इनके मुख से मधुर वाणी निकलती थी जो सबके मन का हरण कर लेती थी एवं सुख देनेवाली थी ।
हे भाई! श्री वृन्दावन धाम को छोड़ कर कहीं भी सच्चा सुख प्राप्त नहीं होता, इसलिए तू सब कुछ त्यागकर शीघ्र ही उस परम धाम की ओर भाग चल। वहाँ भूख लगने पर मधुकरी माँगकर खा लेना और प्यास लगने पर जमुना का नीर पी लेना।
अब मैं श्री वृंदावन धाम में ही जाकर रहूँगी, जहाँ उन्मत्त भाव से भजन करूँगी और दुःखमय संसार का चिंतन सपने में भी नहीं करूंगी। चाहे कोई कुछ भी कहे या करे, मैं दृढ़ निश्चय के साथ श्री हरि के चरणों का ही आश्रय लूँगी।
श्री वृंदावन की ओर दौड़ते हुए, कालिन्दी के तट पर जाकर, "राधा राधा" का गान करते हुए हम अपने जीवन का पालन करेंगे।
अनन्य रसिकाचार्य श्री स्वामी हरिदास जी की परंपरा में यों तो अनेकानेक समर्पित भक्त और साधक हो चुके, उन सब में श्री भगवतरसिक जी का अपना विशिष्ट महत्व और स्थान है।
साधक को चाहिए की वह सबेरे(अपेन विश्राम) कुंज से उठकर सबसे पहले श्री यमुना जी में स्नान करे, फिर निधिवन को प्रणाम करता हुआ श्री बांकेबिहारी जी महाराज के दर्शन करे ।
हे श्री राधिके, आप समस्त सुखों को प्रदान करने वाली हैं, आप नित्य यौवन अवस्था को प्राप्त हुई मुकुट मणि हैं। आप श्री कृष्ण के नीले घन समान तन के रूप की चातकी हैं एवं श्री कृष्ण चंद्र मुख के किरण की चकोर हैं (श्री कृष्ण चंद्र मुख को चकोर की भाँति देखती रहती हैं) ।
साधक को चाहिए कि वह कुत्ते और मृगराज-सिंह की वृत्ति को त्यागकर मधुकरी वृत्ति से उदर-पूर्ति करता हुआ, जीभ से श्री युगल का नाम-स्मरण और नेत्रों से उनके रूप-माधुरी का अवलोकन करता रहे।
सनातन गोस्वामी (1488-1558 ई.पू.) चैतन्य महाप्रभु के मुख्य शिष्य और वृंदावन के छह गोस्वामियों में से एक थे। जिनमे से उनके भाई रूप गोस्वामी भी एक थे।