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  1. श्री कल्याण पुजारी जी की जीवनी

    कल्याण पुजारी जी दृढ व्रत धारण करनेवाले भक्त हैं जो नवल किशोर श्री श्यामाश्याम के अनन्य रस-उपासक हैं । इनके मुख से मधुर वाणी निकलती थी जो सबके मन का हरण कर लेती थी एवं सुख देनेवाली थी ।

  2. वृन्दावन तजि सुख नहीं भजि चल भजि चल वीर - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (254)

    हे भाई! श्री वृन्दावन धाम को छोड़ कर कहीं भी सच्चा सुख प्राप्त नहीं होता, इसलिए तू सब कुछ त्यागकर शीघ्र ही उस परम धाम की ओर भाग चल। वहाँ भूख लगने पर मधुकरी माँगकर खा लेना और प्यास लगने पर जमुना का नीर पी लेना।

  3. वृन्दावन अब जाय रहूँगी विपति न सपनेहुँ जहाँ लहूँगी - श्री जुगलप्रिया जी

    अब मैं श्री वृंदावन धाम में ही जाकर रहूँगी, जहाँ उन्मत्त भाव से भजन करूँगी और दुःखमय संसार का चिंतन सपने में भी नहीं करूंगी। चाहे कोई कुछ भी कहे या करे, मैं दृढ़ निश्चय के साथ श्री हरि के चरणों का ही आश्रय लूँगी।

  4. स्वामी श्री भगवत रसिक जी की जीवनी 

    अनन्य रसिकाचार्य श्री स्वामी हरिदास जी की परंपरा में यों तो अनेकानेक समर्पित भक्त और साधक हो चुके, उन सब में श्री भगवतरसिक जी का अपना विशिष्ट महत्व और स्थान है।

  5. कुंजन तै उठी प्राप्त - श्री भगवत रसिक, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [उतरार्द्ध] (37)

    साधक को चाहिए की वह सबेरे(अपेन विश्राम) कुंज से उठकर सबसे पहले श्री यमुना जी में स्नान करे, फिर निधिवन को प्रणाम करता हुआ श्री बांकेबिहारी जी महाराज के दर्शन करे ।

  6. जयति श्री राधिके सकल सुख साधिके - श्री गदाधर भट्ट

    हे श्री राधिके, आप समस्त सुखों को प्रदान करने वाली हैं, आप नित्य यौवन अवस्था को प्राप्त हुई मुकुट मणि हैं। आप श्री कृष्ण के नीले घन समान तन के रूप की चातकी हैं एवं श्री कृष्ण चंद्र मुख के किरण की चकोर हैं (श्री कृष्ण चंद्र मुख को चकोर की भाँति देखती रहती हैं) ।

  7. जीभ जुगल नामहिं जपै - श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [पूर्वार्ध] (16)

    साधक को चाहिए कि वह कुत्ते और मृगराज-सिंह की वृत्ति को त्यागकर मधुकरी वृत्ति से उदर-पूर्ति करता हुआ, जीभ से श्री युगल का नाम-स्मरण और नेत्रों से उनके रूप-माधुरी का अवलोकन करता रहे।