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राखि हृदै प्रिय प्रेम सुधा-रस - श्री नागरीदेव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (18)
यह पद साधक के उस करुण भाव को प्रकट करता है, जहाँ वह श्री नित्यविहारिणी जू (श्री राधा) से विनम्र निवेदन करता है— हे स्वामिनी! आप तो प्रेमरस की अमृतधारा हैं, फिर आपने अपने उस प्रेम-रस-सुधा रूपी खज़ाने को छिपाकर सारहीन विषय-प्रपंच रूपी भूसे में क्यों उलझा दिया है?
तुम मेरी राखो लाज हरि - श्री सूरदास, सूर सागर
हे श्री कृष्ण, कृपया मेरी लाज रख लें। आप सर्वज्ञ हैं, सब कुछ जानने वाले हैं, मैंने कोई भक्ति नहीं की है।
श्रीविपिनराज महिमा अपार - श्री अली माधुरी जी, श्री निकुञ्ज केली माधुरी
श्री वृन्दावन की महिमा अपार है, जिसका श्री राधा कृष्ण के रसिक भक्तगण नित्य ही अपने ह्रदय में ध्यान करते है ।
एक पकौरी सब जग छूट्यौ - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (300)
इस पद में महाप्रसाद की महिमा का वर्णन करते हुए श्री हरिराम व्यास जी कहते हैं कि जप, तप, व्रत, संयम आदि सब कुछ करके मैं हार गया, मेरा मन तनिक भी न टूटा परंतु श्री राधा वल्लभ लाल के महाप्रसाद की एक पकौड़ी ने मेरा समस्त संसार छुड़वा दिया ।
ठाकुर नाहीं दूसरों, श्री राधा रमण समान - ब्रज के दोहे
श्री राधा रमण के समान दूसरा कोई ठाकुर नहीं है। इसलिए, सांसारिक प्रपंचों को त्यागकर, केवल उन्हीं का ध्यान करना चाहिए।
यह जु एक मन बहुत ठौर करि - श्री हरिवंश महाप्रभु, श्री हित चौरासी (59)
यह पद श्री हित हरिवंश महाप्रभु ने श्री हरिराम व्यास के प्रश्नों के उत्तर में कहा था, जिसके बाद श्री हरिराम व्यास जी उनके शिष्य बन गये थे।
हमारी राधे, दीनन की रखवार - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
हमारी कीर्ति - कुंवरि राधिका दीनों की रक्षा के हेतु सदा कटिबद्ध रहती हैं | दीनों की करुण - पुकार को सुनते ही तत्क्षण ही विह्वल होकर उसके पास आ जाती हैं |
मानुष कौ तन पाइ भजौ ब्रजनाथ कौं - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित स्फुट वाणी (09)
मनुष्य का शरीर पाकर ब्रजनाथ का भजन करो। अरे मूढ़, तू कलछी के समान मनुष्य शरीर पाकर भी संसार की अग्नि में अपने हाथ को जला रहा है।
झूठी बात सांची करि दिखावत - श्री स्वामी हरिदास, अष्टादश पद (14)
प्रस्तुत पद में श्री हरिदास जी ने जीव की अति प्रबल संसार आसक्ति को देखकर श्री बिहारी जी से ही कहते हैं कि आप ऐसे नागर नटवर शिरोमणि हो जो कि इस मिथ्या (झूठे) मायिक जगत को ही सच्चा कर दिखा रहे हो।
आदि अन्त जाकौ नहीं - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (25)
सदा सुख-वर्षण करने वाला यह अनादि-अनन्त श्री वृन्दावन धाम त्रिगुणात्मक प्रपंच—माया—के स्पर्श से भी सर्वथा परे है।
काहू कौ बस नाहिं, तुम्हारी कृपा तें सब होय बिहारी-बिहारिनि - श्री हरिदास जी, अष्टादश पद (02)
हे बिहारी बिहारिणी! सुर-मुनि मोहिनी आपकी दुर्जय माया की प्रबलता ऐसी है कि किसी का भी बल नहीं है जो अपने साधन-प्रयत्न से आपकी माया से पार हो सके। जो कुछ भी होता है, वह आपकी कृपा से ही होता है। जीव को आत्मस्वरूप का ज्ञान और भक्ति का साधन, सब कुछ आपकी कृपा का ही परिणाम है।
नेम करो तुम कोटिन हू पै प्रेम बिना नहि काज सरैगो - श्री प्रिया दास
आप अनंत प्रकार की साधनाएँ कर सकते हैं, लेकिन आप जब तक हृदय से प्रेम नहीं करेंगे, आपका प्रयास सफल नहीं होगा। एक चलती हुई बादल से लाखों बूंदें गिर सकती हैं, लेकिन जब तक एक केंद्रित वर्षा नहीं होती है, तब तक सूखी झील को भरा नहीं जा सकता है। श्री प्रिया दास कहते हैं, "आप चाहे जितना भी ज्ञान या योग का अभ्यास करिये, लेकिन जब तक आप श्री राधा का नाम नहीं लेंगे, तब तक दुखों से मुक्ति नहीं मिलेगी। यदि आप वास्तव में आनंद प्राप्त करने की इच्छा रखते हैं, तो आपको सभी प्रपंचों को त्यागकर ब्रज में रहना होगा। “
हित हरिवंश प्रपंच बंच सब काल व्याल कौ खायौ - श्री हरिवंश महाप्रभु, श्री हित चौरासी (59)
श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभुपाद कहते हैं यह विश्व प्रपञ्च एक दम झूठा है – असत् है और काल सर्प से ग्रसित है ( अर्थात् अवश्य विनाशी है , ) ऐसा अपने हृदय में समझ कर मैंने श्रीश्यामा श्याम पद कमल सङ्गी – रसिक भक्त जनों को अपना मस्तक झुका दिया अर्थात् उनके प्रति समर्पण पूर्वक मैंने उनका ही एक मात्र चरणाश्रय ग्रहण किया है ।