जुगलवर जानत हो सब बात - श्री रूपमाधुरी जी की वाणी, पदावली (100)
हे युगल सरकार! आप सब कुछ जानते हैं। कृपया मुझे वृंदावन वास वरदान कीजिए, क्योंकि मेरे हृदय को अब और कुछ भी नहीं भाता है ।
तुषारकुन्दोज्वलादेहयष्टिर्काश्मीरकपूर विलिप्तदेहा। विनोदयंति हरिणं वनांते वीणाधरा राजति तोडिकेयम्॥ - देवर्षि नारद, राग निरूपणम् (74) टोडी कौशिक की पत्नी हैं। बर्फ की तरह सफ़ेद रंग का उनका पतला शरीर है जो कश्मीर के कपूर से अभिषिक्त है। वह हाथों में वीणा पकड़े हुए जंगल के अंत में हिरणों का मनोरंजन कर रही हैं। राग टोडी को सुबह देर से गाया जाता है।
12 संकीर्तन उपलब्ध हैं
हे युगल सरकार! आप सब कुछ जानते हैं। कृपया मुझे वृंदावन वास वरदान कीजिए, क्योंकि मेरे हृदय को अब और कुछ भी नहीं भाता है ।
तुम्हारी जैसी सुंदरता और कोई नहीं है। तुम्हारे अंग-अंग सुंदरता के सदन हैं। हे सखी, तुम्हारी चपल भौहें ऐसी अनियारी हैं कि तीनों लोक वशीभूत हो जाते हैं और उन पर शासन करती हैं।
श्री बांके बिहारी का आसन एवं सिंहासन बाँका है और बाँके तकियों की छवि भी सुंदर है !
आज श्री कुंज बिहारी लाल झूला झूल रहे हैं । ऐसा अद्बुत रत्नों से जटित वह झूला बना है जो बहुत विशाल है एवं अत्यंत ही सुख प्रदान करने वाल है ।
श्री राधा की पावन पद रज का मैं वंदन करता हूँ जो नित्य ही श्री श्यामसुंदर द्वारा सेवित है, परम पुण्यमय है एवं तीन प्रकार के तापों का विनाश करने वाली है ।
श्री राधा कृष्ण नृत्य कर रहे हैं। सहचरियाँ ताल मृदंग इत्यादि बजा रही हैं और बीच बीच में मोहन श्री कृष्ण मुरली की तान उस ताल से मिला कर बजा रहे हैं।
अरे मूर्ख, यदि तुमने हमारी श्री राधा रानी की शरण नहीं ली और उनके चरणों की रज को त्याग दिया, तो योग, यज्ञ, तप, साधना आदि से क्या आशा रखते हो?
श्याम वर्ण वाले श्री कृष्ण अत्यंत ही सुंदर हैं, जिनके श्याम रंग की ही अल्कें एवं बेनी अत्यंत भारी हैं। श्याम रंग की ही भौंहें एवं अखियों में भी श्याम रंग का ही काजल लगा हुआ है।
एक सखी श्री राधा से कहते है कि, हे प्यारी : रसिक सिरमौर श्री कृष्ण वृन्दावन की कुंजों में सोहनी लगाते हुए, वृन्दावन की रज की पूर्ण निष्ठा में श्री "राधा राधा" नाम का जाप कर रहे हैं एवं आपके गुणों का गान करते हैं।
(श्रीहित सजनी कहती हैं-) "सखियों! देखो आज ब्रज सुंदरी श्रीराधा और मोहन की क्रीड़ा (कैसी भली) बनी है। रूप की राशि युगल किशोर परस्पर एक के स्कन्ध पर दूसरे की बाहुलता लपेट कर ऐसे शोभित हैं मानो तमाल (द्रुम) से सरस स्वर्ण बेलि लिपट रही हो।
हे प्यारी, मेरे नयन तो हमेशा तुम्हारे मुख कमल के भ्रमर बने एक पल के लिये भी यदि इन्हें तुम्हारे मुखारविंद के दर्शनों से वंचित रहना पडे तो ये बेचैन हो उठते हैं, अत्यंत अधीर हो जाते है, मैं इन्हें हटाना चाहूँ तो भी नहीं हटते।
हे श्यामा प्यारी ! तुम्हारा यह मुखारविंद सब सुखों का घर है- कमल और चंद्रमा इसकी बराबरी नहीं कर सकते।