ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण हिंदू धर्म का एक प्रमुख पुराण (महा-पुराण) है। श्री राधा और कृष्ण से सम्बंधित है ।

18 लेख उपलब्ध हैं

  1. अथवा ते प्रवक्ष्यामि परं हेत्वन्तरं शृणु - ब्रह्मवैवर्तपुराण - 4.17.213-214 (खण्डः 4 [श्रीकृष्णजन्मखण्डः]/अध्यायः 17 / छंद 213-214)

    नारायण कहते हैं - हे नारद! पुण्यक्षेत्र भारत में ‘वृन्दावन’ नाम पड़ने का एक अत्यन्त गूढ़ कारण कहता हूँ—तुम उसे ध्यानपूर्वक सुनो। श्रुति में वर्णित श्री राधा के सोलह पवित्र नामों में से एक नाम ‘वृन्दा’ है। इस वन में श्री राधा सदा रमणीय क्रीड़ा करती हैं, इसी कारण यह ‘वृन्दावन’ नाम से प्रसिद्ध हुआ है।

  2. राधा भजति तं कृष्णं स - ब्रह्मवैवर्तपुराण, खण्डः 1 [प्रकृति खण्डः]/अध्यायः 48 / छंद 38 (1.48.38)

    श्री राधा श्रीकृष्ण की उपासना करती हैं, और श्रीकृष्ण श्रीराधा की उपासना करते हैं — दोनों एक-दूसरे के आराध्य और आराधक हैं। संतजन सदा कहते हैं कि दोनों में पूर्ण समानता है अथवा कोई भेद नहीं है।

  3. ये वा द्विषन्ति निन्दन्ति पापिनश्च - ब्रह्मवैवर्तपुराण, खण्डः 4 [श्रीकृष्णजन्मखण्डः]/अध्यायः 97 / छंद 49

    श्रीकृष्ण की प्राण प्रिया श्री राधिकाजी से जो लोग द्वेष करते हैं उनका उपहास करते हैं, निन्दा करते हैं, उन पापी जीवों को निस्संदेह सैकड़ों ब्रह्मत्याओं का पाप लगता है जिसके कारण वे कुंभीपाक और रौरव के नरकों में बहुत काल तक पीड़ित होते हैं।​

  4. राधेत्येवं च संसिद्धा - ब्रह्मवैवर्तपुराण, खण्डः 4 [श्रीकृष्णजन्मखण्डः]/अध्यायः 17 / छंद 223)

    'राधा' नाम यह स्वयं सिद्ध है जिसमें 'रा' कार दान वाचक है। स्वयं निर्वाणदात्री होने से वह 'राधा' कहलाती हैं ।

  5. आदौ राधां समुच्चार्य पश्चात्कृष्णं - ब्रह्म वैवर्त पुराण (2.49.60)

    विज्ञ पुरुष को सर्वप्रथम राधा का तत्पश्चात् कृष्ण के नाम का उच्चारण करना चाहिए । इसमें व्यतिक्रम करने से निःसंदेह उसे ब्रह्म हत्या के समान पाप का सहगामी होना पड़ता है ।

  6. राशब्दोच्चारणादेव स्फीतो भवति माधवः - ब्रह्म वैवर्त पुराण (4.52.38)

    राधा नाम की महिमा इस प्रकार है: जब कोई व्यक्ति 'रा' का उच्चारण करता है तब श्री कृष्ण का रोम रोम हर्ष से प्रफुल्लित होजाता है, पुनः 'धा' का उच्चारण होते ही वह बड़े सत्कार के साथ उसके पीछे-पीछे दौड़ने लगते हैं।

  7. वन्दे राधापदाम्भोजं ब्रह्मादिसुरविन्दतम् - ब्रह्मवैवर्तपुराण खण्ड 4 (श्रीकृष्णजन्मखण्ड) अध्याय 92, श्लोक 64

    उद्धव जी कहते हैं: मैं श्रीराधा के उन चरणकमलों की वन्दना करता हूँ, जो ब्रह्मा आदि देवताओं द्वारा वन्दित हैं तथा जिनकी कीर्ति के कीर्तन से ही तीनों भुवन पवित्र हो जाते हैं।

  8. रा शब्दं कुर्वत स्त्र्स्तो ददामि भक्ति मुत्तमाम् - ब्रह्मवैवर्तपुराण

    श्री कृष्ण कहते हैं: जो 'रा' कहता है, मैं उसे अपनी उत्तम भक्ति प्रदान करता हूँ और जब वह 'धा' कहता है, तो मैं 'राधा' नाम सुनने की इच्छा से उसके पीछे-पीछे डोलने लगता हूँ।

  9. आवयोर्भेदबुद्धिम् वै य: करोति नराधम: (ब्रह्म वैवर्त पुराण)

    मुझमें (श्री कृष्ण में) और तुम में (श्री राधा में) जो अधम मानुष भेद मानता है (एवं दुर्भावना रखकर), वह जबतक चंद्रमा और सूर्य रहेंगे, तब तक ‘कालसूत्र’ नामक नरक में रहेगा।

  10. राधाषोडशनाम्नां च - ब्रह्मवैवर्त पुराण, कृष्ण जन्म खंड (17.219)

    श्री राधा के सोलह नामों में से एक नाम 'वृन्दा' श्रुति-प्रसिद्ध है। श्री राधा का रम्य क्रीडावन होने के कारण श्री राधा को 'वृन्दावनी' भी कहते हैं।

  11. राधा रासेश्वरी रसवासिनी रसिकेश्वरी - ब्रह्म वैवर्त पुराण

    श्री राधा रासेश्वरी हैं, स्वयं मूर्तीमान रस स्वरूप हैं और रसिक शेखर श्रीकृष्ण की स्वामिनी हैं। वह श्रीकृष्ण को प्राणों से अधिक प्रिय हैं, श्रीकृष्ण की प्रिया हैं और स्वयं श्रीकृष्ण स्वरूपा ही हैं।

  12. आधौ नाम तारिहैं श्री ‘राधा’ - ब्रह्म वैवर्त पुराण - कृष्ण जन्म खंड

    ‘रा’ अर्थात आधा नाम राधा शब्द का ही काफी है भवसागर से पार होने के लिए ।‘ध’ कहने से हमारी जो रोज़ आयु नष्ट होती है, वह हानि रुक जाती है। ‘ध’ माने धारण करना, ‘ध’ में जो आता है वह भवरोग को हटाता है।

  13. सर्वासां रसिकानां च देवीनामीश्वरी परा प्रवदन्ति पुरा सन्तस्तेन तां रसिकेश्वरीम् - ब्रह्म वैवर्त पुराण

    समस्त भगवद्स्वरूपो के उपासको में सर्वोत्तम श्रेणी होती है 'रसिक', उन समस्त रसिको की सर्वस्व प्राणाधिक इष्ट/स्वामिनी श्री राधा हैं, अत: श्री राधा का एक नाम 'रसिकेश्वरी' है।

  14. चक्रं चक्री शूलमादाय शूलिपाशं पाशी वज्रमादय वज्री - ब्रह्म वैवर्त पुराण

    ​जो कोई निरंतर राधा नाम गान करता है तो राधारानी की भक्त की रक्षा हेतू, भगवान विष्णु चक्र धारण करके,इन्द्र बज्र लेकर,शंकरजी त्रिशूल लेकर उसके रक्षक बनते हैं।

  15. 'रा' का उच्चारण करने से श्री कृष्ण का रोम रोम प्रफुलित होजाता है - ब्रह्म वैवर्त पुराण

    'रा' का उच्चारण करने से श्री कृष्ण का रोम रोम प्रफुल्लित होजाता है, 'धा' का उच्चारण होते ही वह 'राधा' शब्द का उच्चारण करने वाले के पीछे प्रेम में विभोर होकर भागते हैं ।