रसना! श्रीराधाबल्लभ कहि री - श्री हित कमलनैन, श्री हित कमलनैन जी की वाणी, अष्टायामी पदावली (205)
हे रसना! निरन्तर "श्रीराधाबल्लभ" नाम का ही उच्चारण कर। श्रुति, स्मृति और पुराणों के विविध विषयों में अधिक न उलझकर, इस नाम-रस को दृढ़तापूर्वक ग्रहण कर।
श्री हित कमलनैन, वृंदावन धाम के रसिक संत, श्री राधा वल्लभ सम्प्रदाय से सम्बंधित हैं ।
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हे रसना! निरन्तर "श्रीराधाबल्लभ" नाम का ही उच्चारण कर। श्रुति, स्मृति और पुराणों के विविध विषयों में अधिक न उलझकर, इस नाम-रस को दृढ़तापूर्वक ग्रहण कर।
श्री राधा कहती हैं - प्रियतम मुझे प्राणों से भी अधिक प्रिय हैं। मैं प्रेम से रात-दिन उन्हें हृदय से लगाये रहती हूँ। किंचित् भी अपने से दूर नहीं करती।
श्री श्यामा श्याम वन-विहार करने चले हैं । दोनों नृत्य एवं गान करते हुए सखियों के ह्रदय में प्रेम बढ़ा रहे हैं, दोनों रूप की राशि हैं एवं तीनों लोकों के अंधकार को मिटानेवाले हैं ।
हे सखी, श्री प्रिया प्रियतम की नव निकुंज की केलि परम अद्बुत है । गौर वर्ण श्री राधिका श्याम वर्ण श्री कृष्ण से ऐसे आनंद से लिपटी हैं मानों तमाल वृक्ष से बेलि लिपटी हुई रहती हैं ।
गोस्वामी कमलनैंन जी श्री राधावल्लभ सम्प्रदाय के वाणीकारों में अन्यतम हैं। इनका जन्म श्रीहित कुल में 1635 की आषाढ़ कृष्णा पंचमी के दिन वृन्दावन में हुआ था।
श्री लाल जी के वचन श्री प्रिया जी से: हे किशोरी जी केवल आप ही मेरी जीवन प्राण हो, मैं बार बार ऐसा कह कर तुमको क्या समझाऊँ, मेरी अन्य दूसरी कोई गति है ही नहीं, बस आपका ही एक मात्र अवलंभ है ।
अरे सखी, आनंद की मूर्ति श्री श्यामा श्याम को निहार, कैसा सुंदर दृश्य है जब यह एक दूसरे से लिपटे हुए हैं।
श्री लाड़िली लाल दोनों वृंदावन में विहार परायण हैं । श्री श्यामा श्याम के बड़े एवं सुंदर नैनों को देख देख देख सहचरियों के हृदय और नयन शीतल बने रहते हैं ।
श्री हित कमल नैन जी कहते हैं कि हे मन नित्य ही श्री राधा कृष्ण का भजन कर, जो संसार का मोह एवं पुनः जनम मरण की बाधा को मिटाने वाला है।"
हे सखी, देखो कितनी सुंदर कुंज बनी है । नवल नागरी अरु नागर वहाँ विराजमान हैं जिसकी अत्यंत सुंदर छवि का वर्णन करना सर्वथा असम्भव है ।