ख्याल हुल्लास [बयालीस लीला]

ख्याल हुल्लास श्री ध्रुवदास दास द्वारा रचित श्री बयालीस लीला ग्रंथ का पाँचवा अध्याय है जिसमें प्रेमियों के उल्लासमय मन को समर्पित दोहे संकलित हैं।

12 लेख उपलब्ध हैं

  1. सुनि लै मेरी बात जुगल चरन चित लाइयै - श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, ख्याल हुल्लास (23)

    श्री ध्रुवदास जी कहते हैं कि मैं अपने हृदय की गुह्यतम बात कहता हूँ, ध्यानपूर्वक सुनो — अपने मन को नित्य श्री श्यामा-श्याम के चरणों में ही लगाओ। यह जो मानव-देह का स्वर्णिम अवसर मिला है, इसे व्यर्थ मत गवाओ, अन्यथा आगे चलकर अवश्य ही पछताना पड़ेगा।

  2. अब की देही मनुज की - श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, ख्याल हुल्लास (26)

    नाना योनियों में भटकने के पश्चात्‌ न जाने किस भाग्योदय के फलस्वरूप इस बार यह अमूल्य मनुष्य देह प्राप्त हुआ है, अतएव युगल किशोर के चरण कमलों से अटल अनुराग ही करना चाहिए ।

  3. चढ़ि कै मैन तुरंग पर - श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, ख्याल हुल्लास (47)

    मोम के अश्व पर बैठ कर धधकती हुई अग्नि ज्वाला में से होकर निकल जाना जितना कठिन है, उतना ही कठिन है, प्रेम-मार्ग पर चलना। प्रायः इस पथ का निर्वाह सब से नहीं हो पाता।

  4. प्रेम रंग सौं रँगे जे - श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, ख्याल हुल्लास (45)

    जिनके चित्त युयुगल किशोर के प्रेम-रंग में रँगे हैं और जो इस रस के अतिरिक्त हृदय में किसी अन्य साधन-भजन को स्थान नहीं देते, एकमात्र वही अद्भुत वृंदावनीय युगल-विहार रस-पान के वास्तविक अधिकारी हैं।

  5. सुनि ध्रुव ऐसी चाहियै, छाँड़ि जगत की रीति - श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, ख्याल हुल्लास (19)

    श्री ध्रुवदास जी कहते हैं कि यदि इस रस-मार्ग में आगे बढ़ना है तो जगत के व्यवहार को छोड़कर युगल के कोमल एवं सुंदर चरणारविन्दों से ही अनन्य प्रीति करनी चाहिए।

  6. ज्ञान भजन जो करहु बहु, कौन करै बकवाद - श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, ख्याल हुल्लास (34)

    कुछ लोग ज्ञान मार्ग से परम तत्त्व को पाने के लिए बहुत प्रयास करते हैं, लेकिन वास्तव में यह सब व्यर्थ का श्रम है; यदि आप बहुत सारे व्यंजन बनाते हैं, तो वे बिना नमक के बेस्वाद ही होंगे।

  7. उलटौ पंथ है प्रेम कौ - श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, ख्याल हुल्लास (60)

    प्रेम का मार्ग सर्वथा उलटा और अनोखा है, जहाँ मन का अहंकार और उसकी गति समाप्त हो जाती है; इसी कारण इस प्रेम-पंथ में अपनी स्तुति अप्रिय लगती है और अपमान भी मधुर प्रतीत होता है।

  8. यह रस नित्य-विहार बिनु - श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, ख्याल हुल्लास (7)

    यह दिव्य प्रेम-रस “नित्य-विहार” के बिना न तो कहीं प्रत्यक्ष देखा गया है और न ही श्रवण में आया है। इस नित्य-विहार में प्रेमी और प्रेमास्पद की प्रीति, स्वरूप और आयु सदा एकरस और समान रहते हैं, तथा युगल सरकार अनवरत संयोग-वियोग से परे प्रेम-केलि में निमग्न रहते हैं।

  9. युगल प्रेम रसमाधुरी - श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, ख्याल हुल्लास (10)

    आश्चर्य की बात है कि विषयों में आसक्त जीव नित्य दुःख देने वाले मायिक फलों का ही आस्वादन करता फिरता है, किन्तु नित्य आनंद देने वाली युगल प्रेम-रस-माधुरी में अपने मन को स्थिर नहीं करता।

  10. अब तौ करनी है यहै, वृंदावन करि बास - श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, ख्याल हुल्लास (21)

    अब तो यही सर्वोत्तम उपाय है कि श्री राधा-कृष्ण के युगल-चरणों की छवि और उनके प्रेम-रंग में अपने मन को रंगकर, संसार से उदासीन होकर, श्री वृन्दावन में सदा वास किया जाए।

  11. अब तो ऐसी चित्त धरि - श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, ख्याल हुल्लास (18)

    रे मन! तू ऐसा निश्चय कर कि अब मुझे श्री प्रिया-प्रियतम के चरणों के प्रेम में ही रंग जाना है। तत्पश्चात् तू प्रतिपल उन प्रिया-प्रियतम की अतिशय मधुर लीलाओं और गुणावली का गान कर तथा प्रेमपूर्वक नृत्य कर।