श्री किशोर दास

श्री किशोर दास हरिदासी संप्रदाय के श्री पीतांबर देव जी महाराज के शिष्य थे।

14 लेख उपलब्ध हैं

  1. रसिक अनन्य उपासिका भाव भरे रस ऐंन - श्री किशोर दास, श्री वृंदाविपुन विलास (6)

    रसिक अनन्य उपासक इस प्रकार भाव-विभोर होकर रस से भरे होते हैं कि वे नित्य अपने नैनों से प्रिया-प्रियतम की रसभरी लीलाओं का अवलोकन करते रहते हैं, परंतु अपने वचनों से कुछ भी प्रकट नहीं करते, अर्थात् इसे गोपनीय ही रखते हैं।

  2. रे मन राधे राधे रटि निशिभोर - श्री किशोर दास

    हे मन, निशिदिन राधे राधे रट । समस्त सांसारिक उपाधियों को त्याग कर, निरंतर भक्ति का अभ्यास कर जिससे तुम नित्य किशोर, श्री राधा कृष्ण के सदा अंग-संग ही रहोगे ।

  3. तिनकूँ लाड लडात निति - श्री किशोर दास, श्री वृंदाविपुन विलास (16)

    श्री धाम वृंदावन में परम प्रवीण प्रियतम (कुंजबिहारी) सदा प्रिया जी (श्री राधा) को लाड़ लड़ाते हैं । प्रिया जी के बदनचंद्र को चकित होकर निहारते रहते हैं एवं उनके श्री चरणों के रस में सदा निमग्न रहते हैं ।

  4. वृंदावन की सुधि करत - श्री किशोर दास, श्री वृंदाविपुन विलास (9)

    अनेक साधक श्रीवृंदावन वास की अभिलाषा तो करते हैं, किंतु उनका कभी ऐसा संयोग घटित नहीं हो पाता। प्रभु की यह माया इतनी विचित्र है कि प्रबल इच्छा के उपरांत भी जीव को ब्रज-वास के सौभाग्य से वंचित रखती है।

  5. कर्म-धर्म, तप-क्षेत्र कोउ, कोऊ ज्ञान-मख ठौर - श्री किशोर दास

    कहीं कर्म और धर्म की साधना की भूमि है, कहीं तप और ज्ञान-यज्ञ का क्षेत्र है; परंतु श्री वृंदावन धाम तो विशुद्ध प्रेम की भूमि है, जिसके बिना श्री किशोरदास की कहीं भी वास्तविक गति नहीं है।

  6. नित्य विहारिनि नित्य विहारी - श्री किशोर दास, सिद्धांत सार संग्रह

    विहारिणी श्री राधा नित्य हैं, विहारी श्री कृष्ण भी नित्य हैं, सुख के पुंज मनोहर निकुञ्ज भी नित्य हैं एवं जुगल किशोर श्री श्यामाश्याम का प्रेम भी नित्य है ।

  7. मंगल मनि आनंद निधि, परम प्रेम रस रूप - श्री किशोर दास, श्री वृंदाविपुन विलास (14)

    श्री वृन्दावन साक्षात् मंगलमणि और आनंद की निधि है, जो परम प्रेम-रस का ही साकार स्वरूप है। ऐसे अनुपम श्री वृंदा-विपिन की महिमा अनंत है, जिसकी तुलना संसार की किसी भी वस्तु से नहीं की जा सकती।

  8. ऐसो श्री वृंदाविपुन, परम प्रेम रस रूप - श्री किशोर दास, श्री वृंदाविपुन विलास (8)

    परम [दिव्य] प्रेम रस का साक्षत धारण किया हुआ रूप ही श्री धाम वृंदावन है जहां सर्वोपरि रसिक उपासक, अनूप [सब से निराले] संत जन नित्य ही विचरण करते हैं ।

  9. जैति जैति सब वन नृपति, श्री वृंदावन धाम - श्री किशोर दास, श्री वृंदाविपुन विलास (2)

    समस्त वनों का राजा श्री वृंदावन धाम है, क्योंकि यहाँ श्यामसुंदर के वामांग में परम रमणीय स्वरूप वाली श्री स्वामिनीजी (श्री राधा) प्रेम में उन्मत्त होकर नित्य विराजमान रहती हैं।

  10. बड़ी वस्तु मधि विघन अति, होत न तनक उपाव - श्री किशोर दास, श्री वृंदाविपुन विलास (10)

    श्री वृन्दावन-वास फलस्वरूप है, जिसे प्राप्त करने में अनेक विघ्न आ सकते हैं। इसे प्राप्त करने का अन्य कोई उपाय नहीं; केवल नित्य किशोरी श्री राधिका की कृपा से ही यह सुलभ होता है।

  11. मन तें श्री वृंदाविपिन - श्री किशोर दास, श्री वृंदाविपुन विलास (11)

    साधक को चाहिए कि वह मन से सदा वृन्दावन-विपिन में निवास करे और सखी-भाव धारण करके नित्य श्री ललना-लाल, अर्थात् राधा-कृष्ण, की मधुर छवि का दर्शन करता रहे।

  12. श्री किशोरदास जी की जीवनी 

    मत्स्य देश ढुंढाहर में आमेर नगर में महान् विद्वान्, धर्मी, गुणों के धाम तथा परम भागवत घासीराम सारस्वत ब्राह्मण रहते थे। वे कथा कहने में बड़े प्रवीण थे। उनकी पत्नी खेमा लक्ष्मी जी के समान सुन्दर, उदार और हरिभक्ता थी। उसी की कोख से श्री किशोरदास जी ने जन्म लिया।

  13. सुंदर नित्य बिहारिन वामा - श्री किशोर दास जी की वाणी, नेह तरंग (66)

    सर्वोपरि नित्यविहारिनी ज़ू साक्षात श्री राधिका रानी अत्यंत मोहिनी हैं जिन्हें निरख कर अखिल विश्व को मोहित करने वाले, साक्षात कामदेव को भी मोह लेने वाले श्याम सुंदर भी मोहित हो जाते हैं ।

  14. अब कब कृपा करोगी स्वामिनी - श्री किशोर दास, श्री किशोर दास जी की वाणी, नेह तरंग (47)

    हे स्वामिनी, जो नित्य निकुंजों में नित्य विहार पारायण हैं, जिनका नाम “श्री राधे है", हे श्यामा! आप मुझ पर कब कृपा करोगी?