निकसत जीवहिं बाँधि के तासौं राखति बाल - श्री मतिराम, मतिराम सतसई (380)
हे श्यामसुंदर! यमुना जी के परम पावन तट पर उस कुंज में आपने जो वनमाला दी थी, वह वनमाला ही अब निकलते हुए प्राणों को बाँधकर रखने का काम कर रही है अर्थात् आपकी दी हुई वह वस्तु ही इस विरह में प्राणों का एकमात्र आधार बनी हुई है।
