मो मन गड्यौ स्याम सलोने - श्री नन्ददास
मेरा मन श्रीकृष्ण के अति सुंदर साँवले स्वरूप में रच-बस गया है और उनके अंग-प्रत्यंग की अपूर्व शोभा में डूबकर तैर रहा है।
पदावली श्री नंददास जी द्वारा रचित नंददास ग्रंथावली का चौदहवाँ अध्याय है जिसमें श्री कृष्ण लीला से सम्बंधित अनुमानतः 200 पदों का संग्रह किया गया है।
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मेरा मन श्रीकृष्ण के अति सुंदर साँवले स्वरूप में रच-बस गया है और उनके अंग-प्रत्यंग की अपूर्व शोभा में डूबकर तैर रहा है।
इस पद में सखियाँ श्री राधा की सुंदरता और उनके प्रति श्री कृष्ण के समर्पण का वर्णन करती हुई कहती हैं कि हे सखी! तेरी सहज मनमोहक मुस्कान ने श्री कृष्ण को मोह लिया है। सारा संसार जिनका यश गाता है, वे श्री कृष्ण अब तुम्हारे अधीन हैं।
यमुना के तट पर, बंसीवट की शीतल छाया में, बांसुरी की मधुर ध्वनि गूँज रही है। रसिक श्रीकृष्णचंद्र ने वन में रास लीला का दिव्य आयोजन रचा है।
भक्तों पर श्री यमुना जी विशेष कृपा करती हैं।
यदि पर्वत रुचिकर हो तो श्रीगोवर्धन में निवास करो, यदि ग्राम रुचिकर हो तो नंदगाँव में निवास करो।
श्री राधा और श्री कृष्ण दोनों ने अपनी बेसर (नथ) पर दांव लगाया और ललिता जू से पूछा, "किसकी नथ अधिक सुंदर है?"
जिसके नाम को वेद रटते हैं, ब्रह्मा रटते हैं, भगवान शिव रटते हैं, शेष रटते हैं, नारद, शुकदेव एवं वेद व्यास जी रटते हैं लेकिन पार नहीं पाते।
हे प्यारी राधिके, तुम्हारी चढ़ी हुई भौंह को देखकर ही श्री लाल जी (श्री कृष्ण) त्रिभंगी मुद्रा में आ जाते हैं और अंजन छुवाने के कारण श्याम कहलाते हैं।
श्री नंददास जी एक सखी रूप से अन्य सखी से कहते हैं कि - हे सखि ! जब से कानो में कृष्ण का नाम सुना है , तब से मैं अपना घर संसार भूल, बाँवरी बन गयी हूँ ।
आज सब जन राजा श्री वृषभानु के प्रांगण में बधाई गीत गाकर उत्सव मना रहे हैं जहाँ रानी कीर्ति की कोख में समस्त गुणों से युक्त, सुख की खानी स्वरूपा एक पुत्री [श्री राधा] ने जन्म लिया है ।
श्री नंददास कहते हैं "अरे सखी, तनिक देखो तो नागरनट को, सर पर मुकुट लटक रही है, श्री यमुना के पुलिन पर गोपियों के मध्य कैसा अनुपम नृत्य कर रहे हैं।"