प्रिया प्रसाद (श्री आनंदघन)

'प्रिया प्रसाद' श्री आनंदघन द्वारा लिखित विभिन्न दोहों का एक संग्रह है जिसे श्री आनंदघन जी ने अपने ग्रन्थ 'घनानंद ग्रंथावली' में लिखा है। 'प्रिया प्रसाद' विशेष रूप से श्री राधा और उनके नाम को समर्पित है। लेखक: श्री आनंदघन

13 लेख उपलब्ध हैं

  1. राधा रास-सिरोमनी राधा केलि-कुलीन - श्री आनन्दघन जी, घनानंद ग्रंथावली, प्रिया प्रसाद (81)

    श्रीराधा रास की शिरोमणि और केलि-लीला की परम कुलीन स्वरूपा हैं। वे समस्त कलाओं से परिपूर्ण, स्वयं रसस्वरूपिणी तथा प्रेम में पूर्णतः लीन रहने वाली प्रेम की अधिष्ठात्री हैं।

  2. ब्रजमोहन उर अवनि में राधा-सुपद-विहार - श्री आनन्दघन जी, घनानंद ग्रंथावली, प्रिया प्रसाद (75)

    श्री कृष्ण के हृदय रूपी धाम में श्री राधा के सुंदर चरण सदा विहार करते हैं जिससे उनका रोम रोम आनंद से भीग जाता है।

  3. मधुर केलिरस-झेलि सों - श्री आनन्दघन जी, घनानंद ग्रंथावली, प्रिया प्रसाद (69)

    प्रिया प्रीतम की केली लीलाओं के मधुर रस में डूबकर, रसना दिव्य "राधा" नाम का अति अद्भुत आनंद लेती है, जो मनमोहक वाणी रूपी लता का ऐसा सुफल (सुंदर फल) है, जिसका रस अद्वितीय है और जिसकी कोई तुलना नहीं की जा सकती।

  4. दोऊ मिलि एकै भए - श्री आनन्दघन जी, घनानंद ग्रंथावली, प्रिया प्रसाद (73)

    श्रीराधा-कृष्ण की यह दिव्य रसीली जोड़ी प्रेम के अतिरेक में मिलकर पूर्णतः एक हो गई है। मेरी यही एकमात्र अभिलाषा है कि यमुना के पावन तट पर, सघन कुंजों और लताओं की ओट में विहार करती इस जुगल छवि का मैं सदैव दर्शन करता रहूँ।

  5. राधा रसिक सँजीवनी - श्री आनन्दघन जी, घनानंद ग्रंथावली, प्रियाप्रसाद (78)

    श्री राधा ही रसिकों के लिए प्राण-दायिनी संजीवनी के समान हैं और वे ही प्रियतम लाल (श्री कृष्ण) का जीवन-प्राण हैं। ब्रज के वनों की प्रत्येक लता और तमाल के वृक्षों में साक्षात् श्री राधा और मोहन का ही स्वरूप समाया हुआ है; यहाँ सर्वत्र केवल वे युगल ही व्याप्त हैं।

  6. राधा मोहन मुख लगी - श्री आनन्दघन जी, घनानंद ग्रंथावली, प्रियाप्रसाद (80)

    मुरली श्री राधा-कृष्ण के मुख से दिन-रात बजती रहती है, अधर रस को नित्य पीती रहती है, और मुरली निरन्तर ‘राधा-राधा’ रटती तथा गुणगान करती रहती है, जिसकी धुन अत्यंत मोहिनी है।

  7. मेरे मन दृग रीझि की - श्री आनन्दघन जी, घनानंद ग्रंथावली, प्रिया प्रसाद (70)

    मेरे मन की इच्छा को श्री राधारानी तुरंत जान लेती हैं, और श्री राधारानी के हृदय की बात भी मेरे हृदय में तुरंत स्फुरित हो जाती है।

  8. जो कछु है सो राधिका - श्री आनन्दघन जी, घनानंद ग्रंथावली, प्रिया प्रसाद (82)

    मुझे जो भी चाह है, वह केवल श्री राधिका जी ही हैं—और कुछ नहीं। श्री राधा-चरण-रति ही मेरा प्रण और प्रतिज्ञा है, उसे निभाने का उत्तरदायित्व भी स्वयं श्री राधा के ही हाथों में है। वे ही अपनी कृपा से इस शरणागति को पूर्ण करेंगी।

  9. कहिबो सुनिबो समझिबो - श्री आनन्दघन जी, घनानंद ग्रंथावली, प्रिया प्रसाद (66)

    जीवन में जो कुछ भी कहना, सुनना और समझना हो, वह केवल श्री राधा के विषय में ही होना चाहिए। जो भाग्यशाली जीव इस संसार को पूरी तरह भूलकर केवल श्री राधा के प्रेम की कथा का निरंतर स्मरण और चिंतन करता है, वही वास्तव में धन्य है।

  10. राधा राधा नाम को - श्री आनन्दघन जी, घनानंद ग्रंथावली, प्रिया प्रसाद (88)

    श्री राधा नाम के रटन से जिह्वा को महास्वाद की अनुभूति होती है; इसलिए इस ग्रन्थ के इस प्रबंध को भी “प्रियाप्रसाद” नाम प्राप्त हुआ है, जिसमें एकमात्र श्री राधा के गुणों का ही संवाद है।