श्री चंद्र लाल गोस्वामी
श्री चंद्र लाल गोस्वामी, चाचा वृन्दावन दास जी के समकालीन, श्री राधा वल्लभ संप्रदाय के रसिक थे। यह श्री वनचंद्र जी की कन्या श्री किशोरी जी के वंश में थे।
11 लेख उपलब्ध हैं
मन की गति तौं तुम - श्री चंद्र लाल गोस्वामी जी, अभिलाष बत्तीसी
हे स्वामिनी जी! मेरे हृदय की वास्तविक दशा तो आप भली-भाँति जानती ही हैं; इस शरीर के बल से तो मुझसे कोई तप या आध्यात्मिक साधन सफल नहीं हो सकता। मैं नहीं जानता कि आपके किस अपार कृपा-बल से मुझे रसोपासना के परम आचार्य श्री हरिवंश महाप्रभु का यह पावन मार्ग प्राप्त हुआ है।
जाति पाँति नाना भांति कुल अभिमान तजि - श्री चंद्र लाल गोस्वामी जी, अभिलाष बत्तीसी
जाति, पंथ और कुल का अभिमान त्यागकर, मैं नित्य रसिकों के चरणों में श्रद्धापूर्वक सिर नवाऊँगा।
महाछवि राजें कोटि भानु लिखि लाजैं रूप - श्री चंद्र लाल गोस्वामी जी, वृंदावन प्रकाश माला
निज धाम श्री वृंदावन में दिव्य युगल श्री राधा-कृष्ण एक दूसरे के अंक में विराज रहे हैं, जिनकी महाछवि की कांति कोटि-कोटि सूर्यों की आभा को भी तुच्छ कर रही है।
हिय अकुलाल तरसात सरसात सदा - श्री चंद्र लाल गोस्वामी जी, अभिलाष बत्तीसी
मेरा हृदय अकुला रहा है, तड़प रहा और व्याकुल हो रहा है; मैं आज बार-बार विनती करता हूँ, कृपया शीघ्र अपनी कृपा प्रदान करें।
एक अहंता ममता ये हैं, जग में अति दुखदाई - श्री हित चंद्र लाल गोस्वामी जी
अहंता और ममता यदि इस संसार में हो तो वह परम दुखदाई होती है, परंतु जब यह श्रीजी (श्री राधा) की ओर लग जाती है तो परम सुखदाई बन जाती है।
राज चक्रवर्ती हू कों - श्री हित चंद्र लाल गोस्वामी जी
मेरा मन पृथ्वी के नश्वर राज्यादि के सुखों का आदर नहीं करता और स्वप्न की सी माया जानकर उसको त्याग देता है।
सब भय छौड़ि अब लाड़िली की आड़ लीहै - श्री चंद्र लाल गोस्वामी जी
हमने सब प्रकार के भय एवं आश्रय को त्याग कर अनन्य रूप से श्री लाड़ली [श्री राधा] की ही आड़ (आश्रय) ली है और हमें श्री विपिन बिहारी लाल पर पूर्ण भरोसा है ।
राधा कृष्ण गावै रोम-रोम हरसावै - श्री चंद्र लाल गोस्वामी जी, अभिलाष बत्तीसी
जिनके द्वारा श्री राधा कृष्ण का गुणगान करने से रोम रोम हर्षित हो जाता है एवं प्रेम की मानो झरी से लग जाती है एवं अंग अंग पुलकित हो उठता है।
वृन्दावन की तौ उपमा कौं वृन्दावन ही हैं - श्री चंद्र लाल गोस्वामी जी, वृंदावन प्रकाश माला (3)
श्री वृन्दावन धाम की उपमा स्वयं श्री वृन्दावन ही है, इसकी तुलना किसी और से करना असंभव है। यह अत्यधिक मधुर और दिव्य है, इसलिए मैं इस पवित्र धाम का वंदन करता हूँ।
वृंदावन वास श्यामा श्याम को निवास - श्री हित चंद्र लाल गोस्वामी, वृंदावन प्रकाश माला (2)
जहां श्यामा-श्याम का नित्य निवास है, ऐसे श्री वृंदावन धाम में ही नित्य वास करते हुए, हृदय में नित्य हुलास रखते हुए श्री श्यामा-श्याम का भजन कर, उनको नित्य प्रसन्न करने की आशा को हृदय में धारण करूँगा।
रूप के सरोवर में अली कुमुदावली हैं - श्री चन्द्रलाल गोस्वामी, भावना पच्चीसी
गोस्वामी चन्द्रलाल जी कहते हैं, "रूप के उस दिव्य सरोवर में सखीगण मानो श्वेत कमल की कलियाँ हैं, श्री कृष्ण चकोर हैं, और श्री राधा का मुख कमल जैसे चंद्रमा है, जिसे देखकर और रस का पान कर श्री कृष्ण जीवित हैं।"