श्री गोवर्धन भट्ट

ब्रज धाम के गौड़ीय वैष्णव श्री गोवर्धन भट्ट

11 लेख उपलब्ध हैं

  1. भ्रंसिन्या - श्रीगोवर्द्धन भट्ट, श्री राधाकुण्ड स्तव (49)

    अरे मन! श्री कृष्ण के चरण कमलों के प्रेमधन को नष्ट कर देने वाली स्त्रियों के परिहासमय स्नेह वचनों में फँस कर प्रेमधन से वञ्चित मत हो। पुत्र-मित्र-वैभवों को नश्वर जान कर उनकी आकांक्षा मत करो। निरन्तर राधादास्य प्रदानकारी वृषभानुनन्दिनी सरसी अर्थात् श्री राधाकुण्ड का ध्यान करो।

  2. श्रीवृन्दाविपिनेश्वरी हृदिगतं प्रेमैव - श्रीगोवर्द्धन भट्ट, श्री राधाकुण्ड स्तव (47)

    यह मेरा दृढ़ विश्वास है कि मानो वृन्दावनेश्वरि, श्री राधा महारानी के हृदय में स्थित प्रेम ही इस कुंड (श्री राधाकुंड) के रूप में बाह्य रूप से प्रकट हुआ है। वह प्रेम अपरिमित रूप से बढ़कर बाहर प्रवाहित हो रहा है। अपनी अनुपम शोभा-समूह से वह गोपराजनन्दन (श्री कृष्ण) सहित सभी को मूर्छित कर देता है और फिर प्रमोद-सुधा में स्नान कराकर उन्हें पूर्णतः धौत कर देता है।

  3. किं कृष्णस्यैव रूपं त्रिभुवनमनसो - श्रीगोवर्द्धन भट्ट, श्री राधाकुण्ड स्तव (46)

    अहो! श्रीराधाकुण्ड का कैसा अद्भुत स्वरूप है! क्या यह त्रिभुवन-मनोहर श्रीकृष्ण का ही रूप है जो कुण्ड के रूप में विराजमान है? या फिर यह यूथेश्वरी श्रीराधा का प्रेम ही मूर्तिमान होकर कुण्ड के रूप में शोभित है? या दोनों (राधा-कृष्ण) की दिव्य क्रीड़ा ही इस रूप में विजयी होकर प्रकट हुई है? इस प्रकार का संदेह करती हुई, जहाँ श्रीराधा की प्रणय-सखियाँ, अत्यधिक आमोद-विलास में भ्रमित होकर इधर-उधर घूमती रहती हैं, ऐसे सुरम्य, महापुरुषों द्वारा पूज्य और नमनीय श्रीराधा-कुण्ड को प्रणाम करो।

  4. किं धर्मेण ममास्ति - श्रीगोवर्द्धन भट्ट, श्री राधाकुण्ड स्तव (42)

    मेरे धर्म साधन में क्या रखा है। नित्यकृत्य भी अति तुच्छ है। योगादि साधना तथा सद्गुणों से मेरा क्या होगा? ब्रह्म सुख को भी मेरा हृदय नहीं चाहता है। अधिक तो अधिक मुरारी (श्री कृष्ण) के ध्यानादि से भी इष्ट सिद्धि नहीं हो सकती है। वृंदावनेश्वरी की सरसी (श्री राधा कुंड) के अभिमान में मग्न मेरा चित्त अनयत्र नहीं जा सकता है। चित्त तो अत्यंत उन्मत्त होकर कुंड के रसामृत-समुद्र का पान कर रहा है।

  5. श्रीकुण्डाश्रयवन्तमन्तरल - श्रीगोवर्द्धन भट्ट, श्री राधाकुण्ड स्तव (45)

    जो अत्यन्त आदर से हृदय में प्रेमोल्लास के साथ श्री राधाकुंड का आश्रय करता है वह परम भाग्यवान्‌ है । ब्रह्मादी लोकपाल देवतागण भी निज अभिमान को छोड़ कर उसको प्रणाम करते हैं । अधिक क्या कहूँ व्रजराज नंदन (श्री कृष्ण) के मस्तक पर अपने चरणों का महावर लगाने वाली श्रीराधिका को भी कुंडवासी अपने वश में कर लेता है ।

  6. यन्नामश्रवणान्तरे निपतितं - श्रीगोवर्द्धन भट्ट, श्री राधाकुण्ड स्तव (96)

    जिसका नाम कानों के भीतर प्रवेश करते ही बड़े-से-बड़े पतित के भी चित्त के समस्त मलों का नाश कर देता है तथा प्रेम के साथ शरण लेनेवाले जीवों को संसार से उद्धार कर देता हैं और जिसका दर्शन करने पर वृषभानु नन्दिनी के चरण कमलों में प्रगाढ़ कैंकर्य प्राप्त होता है, वह श्रीराधा कुंड श्रेष्ठ समस्त धामों के मस्तक पर विराजमान होकर नृत्य कर रहा है।

  7. वृन्दारण्येशभक्तिः कमलभवशिवेन्द्रा - श्रीगोवर्द्धन भट्ट, श्री राधाकुण्ड स्तव (99)

    वृन्दावनेश्वर श्री कृष्ण की भक्ति का मार्ग लक्ष्मी, ब्रह्मा, शिव, इंद्र आदि देव वृन्द ढूंढते हैं लेकिन प्राप्त नहीं कर पाते। परन्तु राधाकुण्ड में वास करने की कामना करने वाले मनुष्यों को भक्ति स्वयं ढूंढ़ती फिरती है। जिस कुण्ड के नाम के सुनने वाले को भी श्री राधा अपना मानतीं हैं, हम उस कुण्ड को नित्य स्तुतियों द्वारा सादर प्रणाम करते हैं।

  8. श्रीगोष्ठेन्द्रसखात्मजा विरचित क्रीडा समूहै- श्रीगोवर्द्धन भट्ट, श्री राधाकुण्ड स्तव (39)

    श्री वृषभानुनन्दिनी के द्वारा विरचित क्रीड़ा समूह से व्याप्त, राधिका के प्रेम में उन्मदान्ध, गोकुलचन्द्रमा को आनन्द प्रदान करने वाला यह श्रीराधा कुंड कब मेरे लिये वृंदावन सम्बन्धी अंतरंग सुख को प्रदान करेगा ।

  9. राधा दास्य रसाभिलाषसहितं - श्रीगोवर्द्धन भट्ट, श्री राधाकुण्ड स्तव (28)

    हे मानवगण ! यदि श्री राधा दास्य रस में अभिषिक्त होने के लिये मन में इच्छा है तो श्रीवृषभानु नन्दिनी की सरसी में क्यों नहीं वास करते हो । यदि राधाकुंड में प्रीति के साथ वास कर सकते तो अवश्य इसी शरीर में श्री राधिका दर्शन देंगी तथा भविष्य में उनकी पूर्ण करुणा होगी ।

  10. श्रीकुण्डे संततं यो निवसति - श्रीगोवर्द्धन भट्ट, श्री राधाकुण्ड स्तव (100)

    श्रीराधाकुंड में जो पुरुष निरन्तर वास करता हैं, देवता- पितृ तथा मुनिवरों का समूह उसका कुछ भी कर सकने में समर्थ नहीं होते हैं। ब्रजराजनन्दन श्रीकृष्ण भी औरों की सेवा में उसको नहीं जाने देते हैं । केवल अपने निज जनों के साथ अपनी प्रियतमा श्रीराधिका किशोरी की सेवा में ही उसे नियुक्त करते हैं ।

  11. श्रीवृन्दाविपिनेश्वरीं स्वमनसि - श्रीगोवर्द्धन भट्ट, श्री राधाकुण्ड स्तव (74)

    जिसके कुंज में बैठकर श्रीव्रजराजनंदन श्रीकृष्ण अपने मन में वृन्दावनेश्वरी श्रीराधारानी का स्मरण कर रोमांचित होकर “राधा”- इन दो अक्षरों का जाप करते हैं तथा उस समय राधिका वहाँ आकर “आप क्या कर रहे हैं? किस मंत्र का जप कर रहे हैं?” इस प्रकार पूछती हुईं नर्म विस्तार करती हैं, उस रसमय “राधाकुण्ड' को मैं कब देखैूँगा ।