श्री वल्लभ रसिक

श्री वल्लभ रसिक गौड़ीय संप्रदाय के वृंदावन के रसिक संत और श्री गदाधर भट्ट गोस्वामी के शिष्य थे।

9 लेख उपलब्ध हैं

  1. उरज उतंग अति भरित भरे से अंग - श्री वल्लभ रसिक जी की वाणी

    श्री राधा के उरोज अत्यंत उन्नत और पूर्ण रूप से भरे हुए हैं, जिनसे उनका संपूर्ण शरीर सौंदर्य से परिपूर्ण हो उठा है। उनके सुंदर लाल होंठों को देखकर मानो श्री कृष्ण का चित्त उन्हीं के रंग में रंग जाता है, और बुद्धि मोहित हो उठती है।

  2. महल मदन माती अली ये - श्री वल्लभ रसिक जी की वाणी

    श्री राधा के निज महल की सखियाँ, श्री राधा के निज महल के रस में ऐसी उन्मत्त रहती हैं कि उनके (श्री राधा के) अतिरिक्त अन्य किसी को नहीं मानती । यह सखियाँ तो अलबेली (राधा जू) के नित्य ही संग में रहती हैं एवं उनके आभूषण, वस्त्र आदि की अंग सेवा करती रहती हैं ।

  3. इन नैंनों मधि मोहन सोहन - श्री वल्लभ रसिक जी की वाणी, सदा की माँझ (5)

    मेरी आँखों के मध्य में श्रीकृष्ण का मनमोहक रूप समा गया है। धर्म और शिष्टाचार के मार्ग अब सब भूल चुके हैं और समस्त प्रकार के विधि/निषेध फीके पड़ गए हैं ।

  4. आवति बाल लाल रंग भीनी - श्री वल्लभ रसिक जी की वाणी

    श्री श्यामा जू श्री श्यामसुंदर के प्रेम रस में भींजी हुई आ रही हैं । गान करते हुए वे चुटकी लेकर ताल दे रही हैं, उनकी सुगठित कटी प्रदेश लचक रही है, जिसकी छवि सबके ह्रदय को मोहनेवाली है ।

  5. हम तो युगल रूप रस माते नाते के माने - श्री वल्लभ रसिक जी की वाणी, सदा की माँझ (6)

    हम तो श्री प्रिया प्रियतम के युगल रूप के रस में उन्मत्त हैं, अत: केवल हम युगल से ही अपना सारा रिश्ता मानते हैं । हम देह के नातेदारों को अपना मानते ही नहीं एवं उन्हें अपना मानने में अलसाते हैं ।

  6. यद्यपि दोउन की लगन सब मिलि कहैं समान - श्री वल्लभ रसिक जी की वाणी (105)

    यद्यपि सभी संत और रसिक यही कहते हैं कि श्री राधा-कृष्ण दोनों का परस्पर प्रेम और लगन बिल्कुल समान है, परंतु गूढ़ रहस्य यह है कि इसमें श्री राधा प्यारी ही वास्तविक 'महबूब' (प्रेमास्पद) हैं और प्राणप्यारे श्री कृष्ण ही उनके अनन्य 'आशिक' (प्रेमी) हैं।

  7. श्री वल्लभरसिक जी की जीवनी

    श्री वल्लभरसिक जी का जन्म अनुमानतः 1600 के लगभग हुआ है । इनके पिता श्री गदाधर भट्ट जी थे जो एक महान गौड़ीय भक्त हुए हैं । इनके बड़े भ्राता श्री रसिकोत्तंस थे, जिनकी रचना 'प्रेम-पत्तनम्' प्रसिद्ध है ।

  8. हम जुगल महल रस लिंदा - श्री वल्लभ रसिक, श्री वल्लभ रसिक जी की वाणी, सदा की माँझ (23)

    श्री वृंदावन धाम के अनन्य रसिक जन (इस युगल महल - रस के उपासक) कुञ्ज के अलिंद (द्वार कोष्ठ) को उलांघ कर कभी बाहर नहीं जाते ।