सिद्धांत के पद [श्री रूप सखी जी की वाणी]

सिद्धांत के पद, ग्रंथ श्री रूप सखी जी की वाणी में श्रीरूप सखी जू द्वारा लिखित सिद्धांत के पदों का संकलन है। रचैयता: श्री रूप सखी

10 लेख उपलब्ध हैं

  1. नित्यविहार सों करि प्रीति - श्री रूप सखी जी की वाणी, सिद्धांत के पद (61)

    प्रिया-प्रियतम के नित्य-विहार रस से प्रीति करो क्योंकि वही अनन्य रसिक संतों का जीवन सार है। ऐसे अनन्य रसिकों के संग एवं दिखाए मार्ग के अनुसरण करने से भाव-भक्ति में दृढ़ प्रतीति (स्थिर निश्चय) सहज ही प्रकट हो जाती है।

  2. जै श्रीहरिदास रसिक वर की - श्री रूप सखी जी की वाणी, सिद्धांत के पद (36)

    रसिकवर श्रीस्वामी हरिदासजी की सदा जय हो, जिन्होंने इस धराधाम पर अवतार लेकर ऐसा अनुपम अनन्य धर्म प्रकट किया, जिससे विधि-निषेधात्मक शुभ और अशुभ कर्म कांप उठे हैं।

  3. मेरे संत चरण रज अंजन - श्री रूप सखी जी की वाणी, सिद्धांत के पद (99)

    रसिक संतों के चरणों की रज ही मेरे लिए ह्रदय की आँखों को प्रकाश देने वाला अंजन है जिससे तीनों ताप एवं समस्त अंधकार का नाश हो जाता है और काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद मात्सर्य जैसे शत्रुओं के दल के दल विदलित हो जाते हैं ।

  4. प्यारी पिय प्रेम-भक्ति दीजै - श्री रूप सखी, श्री रूप सखी जी की वाणी, सिद्धांत के पद (61)

    हे युगल सरकार पिय प्यारी, मुझे अपनी प्रेम भक्ति प्रदान कीजिए । आपके नाम गुणगान से मेरी वाणी गदगद हो उठे, आपका यश सुन मेरा रोम रोम रोमांचित हो जाए, अश्रुओं की धारा बह जाए, एवं शरीर पुलकित हो उठे ।

  5. करि मन रसिकनी सौं सत्संग - श्री रूप सखी जी की वाणी, सिद्धांत के पद (72)

    अरे मन रसिकों का सत्य संग कर, जिनके सत्संग के प्रभाव से हृदय के समस्त सुकृत भजन में भींज कर रसिकों के हृदय का निज रंग [श्री राधा कृष्ण] हमारे हृदय में भी उपज आता है ।

  6. रसिकवर मोहि सनाथ कियो - श्री रूप सखी, श्री रूप सखी जी की वाणी

    रसिक-शिरोमणि श्रीस्वामी हरिदासजी महाराज ने हमें तो सब प्रकार से सनाथ कर दिया है। उन्होंने हमें दर्शन और चरणामृत का महाप्रसाद देकर जैसे ही हमारे मस्तक पर अपना हस्तकमल रखा कि हमें प्रणयी-युगल श्रीश्यामा-श्याम की मधुर लीलाएँ सहज हो दृष्टिगोचर होने लगीं। जन्म-जन्मान्तर से सन्तप्त हमारा हृदय शीतल हो गया। श्रीरूपसखीजी कहती हैं कि नित्यधाम श्रीवृन्दावन का सुन्दर वास देकर उन्होंने हमें कृतार्थ कर दिया है। कहो तो, उनके जैसा अनन्य-रसिक-सम्राट् और उदार-शिरोमणि इस संसार में दूसरा कौन है ?

  7. बंदे श्रीवृन्दावन की भूमि - श्री रूप सखी जी की वाणी, सिद्धांत के पद (87)

    श्री वृन्दावन की भूमि को वंदन (प्रणाम) है। जहाँ ललित लताएं, द्रुम,बेल आदि कुंदन मणि की तरह प्रतीत हो रही हैं एवं (झूम रही हैं) आनंदित हो रहे हैं।

  8. कीजै रंगमहल की दासी - श्री रूप सखी, रूप सखी जी की वाणी

    श्री रूप सखी श्री राधारनी से प्रार्थना कर रहे हैं कि आप मुझे रंगमहल की दासी कीजिये जहाँ मैं प्रिया प्रियतम की नित्य केलि लीला का दर्शन कर सकूँ और श्री हरिदासी (ललिता सखी) के संग में रहूँ।श्री विट्ठल विपुल देव जी एवं श्री बिहारिन देव जी के आश्रय से समस्त सुखों के सार स्वरूप इस नित्य विहार का सेवन प्राप्त करूँ ।

  9. श्रीराधा दे वृन्दावन वास - श्री रूप सखी जी, श्री रूप सखी जी की वाणी

    हे श्री नित्य बिहारिनि श्री राधा, अब तो मुझे आप वृंदावन वास दीजिए । नित्य ही मैं युगल स्वरूप का अवलोकन करूं एवं रंग हास में परायण रहकर, आपकी नित्य निष्काम सेवा करूं।

  10. कीजै रंगमहल की दासी - श्री रूप सखी, रूप सखी जी की वाणी

    श्री नरहरि दास जी प्रार्थना कर रहे हैं, हे श्यामा जू ! मुझे अपने रंगमहल की दासी बना दो ताकि मैं युगल सरकार के चरणों की निर्विवाद रूप से सेवा कर सकूँ और स्वामी श्री हरिदास जी ने जो वृन्दावन के युगल की लीला माधुरी पर प्रकाश डाला है उसका आस्वादन कर सकू ।