नित्यविहार सों करि प्रीति - श्री रूप सखी जी की वाणी, सिद्धांत के पद (61)
प्रिया-प्रियतम के नित्य-विहार रस से प्रीति करो क्योंकि वही अनन्य रसिक संतों का जीवन सार है। ऐसे अनन्य रसिकों के संग एवं दिखाए मार्ग के अनुसरण करने से भाव-भक्ति में दृढ़ प्रतीति (स्थिर निश्चय) सहज ही प्रकट हो जाती है।
