20 शब्दकोश लेख उपलब्ध हैं

  1. श्री गुणमंजरीदास (श्री गल्लू गोस्वामी) जी की जीवनी

    माध्वगौड़ेश्वराचार्य परम सन्त पूज्य पाद गोस्वामी श्री गल्लू जी महाराज के पिता का नाम श्रीरमण दयालजी महाराज था । श्री गल्लू जी महाराज का जन्म ज्येष्ठ कृष्ण अष्टमी सन् 1827 में हुआ था । इनके एकमात्र पुत्र श्रीराधाचरण गोस्वामी जी हुये । श्रीराधाचरण जी की माँ का नाम श्रीमती सूर्यादेवी गोस्वामी था ।

  2. श्री प्रियाकान्त जू मंदिर - वृन्दावन

    श्री प्रियाकान्त जू मंदिर श्री राधा कृष्ण को समर्पित है जिसे 2009 में विश्व शांति चैरिटेबल ट्रस्ट के अध्यक्ष श्री देवकीनंदन ठाकुर द्वारा स्थापित किया गया था, और इसे पूरा होने में लगभग सात साल लगे ।

  3. प्यारी श्रीवृंदावन की रैनु - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्द्ध (9)

    श्री हरिराम व्यास जी कहते हैं "श्री वृन्दावन की रेणु बड़ी प्यारी है, जिसका दर्शन कर श्री कृष्ण सुख पाते हैं और हर्षित हो मधुर वेणु बजाते हैं।"

  4. श्री गोविन्दशरण देवाचार्य जी की जीवनी

    श्री गोविन्दशरण देवाचार्य जी महाराज अखिल भारतीय जगद्गुरु श्री निम्बार्काचार्य पीठ (सलेमाबाद, किशनगढ़) के एक सुप्रतिष्ठित आचार्य थे। इनकी विद्वत्ता और भक्ति भावना इनकी वाणी के अनुशीलन से स्पष्ट हो सकती है।

  5. श्री चतुर्भुजदास जी की जीवनी

    श्री चतुर्भुजदास जी का जन्म 1597 में ब्रज के जमुनावता ग्राम में हुआ था। इनके पिता अष्टछाप के महान कवी श्री कुम्भनदास जी थे।

  6. श्री गोविन्द स्वामी की जीवनी

    श्री गोविन्द स्वामी (1505 - 1586) मध्य प्रदेश के ग्वालियर के निकट आंतरी ग्राम में रहते थे। वहां ये इसी नाम से जाने जाते थे। इनके मन में सदा यही प्रश्न उठता की "भगवान के चरणारविन्दों की प्राप्ति कैसे होगी ?" इसी प्रश्न का सदैव विचार करते थे।

  7. श्री परमानन्ददास जी की जीवनी

    श्री परमानन्ददास जी का जन्म कन्नौज के एक ब्राह्मण घर में 1493 में हुआ। ये श्री कृष्ण के परमसखा थे और बड़े उच्च कोटि के कवि थे। श्री परमानन्ददास जी अपने रचे पदों को बड़े मधुर राग में गाते और कीर्तन करते। जो भी इनका कीर्तन सुनता वह भाव विभोर हो उठता।

  8. श्री कृष्णदास अधिकारी जी की जीवनी

    गुजरात प्रान्त के चिलोत्रा ग्राम में 1496 में श्री कृष्णदास जी का जन्म हुआ था। ये शूद्र वर्ण के थे। कालांतर में महाप्रभु श्री वल्लभाचार्य की कृपा से श्री कृष्णदास जी को श्रीनाथजी की सेवा प्राप्त हुई और ये पद रचना करते तथा श्रीनाथजी को सुनाते।

  9. श्री हित रूपलाल जी की जीवनी

    1681 ई. के वैशाख कृ० 7 को श्रीहित हरिवंशजी महाराज के कुल में गोस्वामी श्रीरूप लालजी का जन्म हुआ। इनके पिता गोस्वामी श्रीहरिलालजी तथा माता श्रीकृष्णकुँवरि थीं।

  10. श्रीजी का मंदिर, वृन्दावन

    वृंदावन में लोई बाजार में श्रीजी का मंदिर, जगद्गुरु श्री निम्बार्काचार्य द्वारा स्थापित निंबार्क सम्प्रदाय के केंद्र के रूप में माना जाता है। श्री निम्बार्काचार्य जी को श्री कृष्ण का 'चक्र' अवतार माना जाता है। 14 वीं -15 वीं शताब्दी में श्री भट देवाचार्य रसिक संत लेखक ने अपनी पुस्तक "युगल शतक" में श्री निम्बार्काचार्य की रासोपासना मार्ग का वर्णन किया, और उन्ही के शिष्य श्री हरिव्यास देवाचार्य जी ने अपने ग्रन्थ 'महावाणी' (जो की रसोपाससना में शीर्ष ग्रन्थ भी माना जाता है) में रसोपासना का विस्तार से वर्णन किया।

  11. प्रेम मंदिर, वृंदावन

    प्रेम मंदिर (दिव्य प्रेम का मंदिर) वृंदावन, मथुरा, भारत में एक हिंदू मंदिर है। यह जगद्गुरु कृपालु जी के द्वारा बनवाया गया है।

  12. श्री राधा दामोदर मंदिर, वृन्दावन

    श्री श्री राधा दामोदर मंदिर 1542 ईसवी में श्री जीव गोस्वामी द्वारा स्थापित एक प्राचीन मंदिर है। राधा दामोदर की सेवा श्री जीव गोस्वामी द्वारा की जाती थी। श्री राधा दामोदर को श्रील रूप गोस्वामी द्वारा प्रकट किया जिन्हे उन्होंने सेवा और पूजा के लिए अपने प्रिय शिष्य और भतीजे-जीव गोस्वामी को दिया। श्री रूप गोस्वामी, श्री जीव गोस्वामी की समाधि। श्री रूप गोस्वामी के भजन कुटिया और समाधि: श्री श्री राधा-कृष्ण की शीर्ष सेवक श्री रूप मंजरी हैं। उनका भजन-कुटिया और समाधि-मंदिर श्री श्री राधा दामोदर मंदिर के आंगन में स्थित हैं। जीव गोस्वामी समाधि: जीव गोस्वामी की समाधि राधा दामोदर मंदिर में स्थित है। श्रीला कृष्ण दास कविराज गोस्वामी समाधि: श्रीला कृष्ण दास कविराज गोस्वामी की समाधि राधा दामोदर मंदिर में भी स्थित है। अन्य वैष्णव संतों की पुष्प समाधि भी मंदिर में स्थित हैं।

  13. श्री राधारमण मंदिर, वृंदावन

    श्री राधारमण मंदिर संवत 1591में उपस्थित थे। यह मंदिर संवत 1591 में बनाया गया था। मंदिर के निकट श्री गोपाल भट्ट गोस्वामी की समाधि है। उन्होंने मंदिर की स्थापना और सेवा की । तीस वर्ष की आयु में, श्री गोपाल भट्ट गोस्वामी वृंदावन आए। चैतन्य महाप्रभु के चले जाने के बाद, श्री गोपाल भट्ट गोस्वामी भगवान से गहन अलगाव महसूस करते थे। भगवान ने श्री गोपाल भट्ट गोस्वामी को एक सपने में निर्देश दिया कि "यदि आप मेरा दर्शन चाहते हैं तो नेपाल की यात्रा करें"। नेपाल में, श्री गोपाल भट्ट गोस्वामी प्रसिद्ध काली-गंडकी नदी में स्नान कर रहे थे, नदी में अपने पानी के मटके के साथ डुबकी लगाने पर, भट्टजी आश्चर्यचकित हो गए क्योंकि कई शलिग्राम शिला उनके बर्तन में प्रवेश कर गए। इस तरह उन्होंने शालिग्राम पाया।

  14. इमली तला वृन्दावन

    इमली तला का अर्थ है इमली का वृक्ष। दिव्य महारास लीला के दौरान, जब श्री राधा रानी जी रास से अलक्षित हो गई (दूर चली गई), तो श्री कृष्ण इस इमली के वृक्ष के नीचे आकर बैठ गए और श्री राधा रानी का रूप ध्यान किया एवं राधा नाम का जप ( उच्चारण) करने लगे और श्री राधा रानी को यहाँ प्राप्त किया। इसलिए यह जगह इमली तला के रूप में प्रसिद्ध है। श्री राधा रानी का अभिषेक भी यहीं हुआ। श्री चैतन्य महाप्रभु जी ने भगवान श्री कृष्ण के शरीर का रंग भी ग्रहण किया। श्री चैतन्य महाप्रभु जी ने इस वृक्ष के नीचे बैठकर भगवान श्री कृष्ण का श्री राधा रानी से अलग होने का उन्मादपूर्ण (अति आनंदित) भावना में जप किया। यहाँ भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु जी अक्रूर घाट से यमुना तट पर इमली तला के नीचे बैठने के लिए रोज़ाना आया करते थे। आज इस वृक्ष के नीचे भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु जी की एक मूर्ति स्थापित है।

  15. राधा वल्लभ मंदिर- वृन्दावन

    श्री राधावल्लभ मंदिर भारत में उत्तर प्रदेश राज्य के मथुरा जिले में वृन्दावन में स्थित है। यह बांके बिहारी मंदिर के पास है। "श्री राधावल्लभ दर्शन दुर्लभं" श्री राधावल्लभ के दर्शन बहुत दुर्लभ हैं।

  16. राधा गोपीनाथ मंदिर, वृंदावन

    वृजनाभ, भगवान श्री कृष्ण के परपोता ने के पांच हजार साल पहले वृंदावन में मूल राधा गोपीनाथ देवता कीस्थापना की थी। लगभग पांच साल पहले, परमानंद भट्टाचार्य ने यमुना के तट पर बंशीवट में धरती के देवता की खोज की थी। चैतन्य महाप्रभु के करीबी सहयोगी श्री गडधर पंडित के एक शिष्य मधु पंडित गोस्वामी ने गोपीनाथ देवता की पूजा की थी।