ब्रज में ब्रह्मा, विष्णु और शिव पर्वत के रूप में स्थित हैं
बरसाना में, भगवान ब्रह्मा ने पर्वत का रूप धारण किया जिसे "ब्रह्म पर्वत" कहा जाता है।
बृज वृंदावन धाम में श्री राधा कृष्ण की लीला नित्य नवायमान है। राधा कृष्ण एवं सखियाँ नित्य ही क्रीड़ा में संलंग्न रहती हैं । ब्रज धाम में प्रत्येक स्थान श्री श्री राधा कृष्ण की दिव्य लीला से समन्धित है।
71 लीलाएँ उपलब्ध हैं
बरसाना में, भगवान ब्रह्मा ने पर्वत का रूप धारण किया जिसे "ब्रह्म पर्वत" कहा जाता है।
जब भी सखियाँ ब्रज में दुध दही बेचने के लिए जातीं हैं तब ठाकुरजी सखियों का रास्ता रोक कर उनसे दान मांगते हैं । एक दिन सखियों ने विचार कर निश्चय किया की आज हम ठाकुरजी से दान मांगेंगे l
द्वारिकाधीश की पटरानियों ने यमुना जी को अत्यंत प्रमुदित अवस्था में देखा, तो उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ कि हमें तो वियोग कलेशित किये जा रहा है और यमुना जी भी तो श्री कृष्ण की पटरानियों में हैं और यह तो मंद मंद मुस्कुरा रही हैं
परसों, ब्रज - यह लीला, ब्रज लीला के अंतर्गत आती है, जिस समय श्री कृष्ण अक्रूर के रथ पर बैठे थे, प्रस्थान करने के लिए प्रतीक्षा कर रहे थे, और गोपियाँ उनसे वियोग की कल्पना कर आंसू बहाने और तड़पने लगी थीं ।
श्याम कुटीर रत्न सिंहासन के पास स्थित है। यहाँ, श्री श्यामासुंदर ने श्याम वस्त्रों में, श्याम रंगकी कस्तूरी का अंगों में अनुलेपन कर, अपने शरीर को श्याम रंग के अलंकार से पिरो दिया था।
एक बार चैतन्य महाप्रभु राधा कृष्ण के चिंतन युक्त वृंदावन की परिक्रमा पर थे, और वह गोवर्धन के पास से हो कर परिक्रमा कर रहे थे । कुछ आगे बढ़ने पर चैतन्य महाप्रभु जी ने देखा आमने-सामने वृक्ष की डालियों पर शुक सारी परस्पर प्रेम-कलह करते हुए श्री राधा कृष्ण युगल का गुणगान कर रहे हैं।
पौराणिक कथाओं के अनुसार श्री कृष्ण, श्री राधारानी और गोपियों के साथ यमुना में स्नान करते थे | श्री गंगा जी (श्री यमुना जी की बड़ी बहन) को दिव्य दम्पति श्री राधा कृष्ण (प्रिया प्रियतम) की सेवा की प्रबल इच्छा हुई
एक बार श्री कृष्ण और राधा रानी एक साथ बैठे हुए थे। एक मधुमक्खी राधा रानी के पास भिनभिना रही थी। कृष्ण ने मित्र को इसे दूर करने के लिए कहा। जब मित्र मधुमक्खी को दूर करके लौट आया, तो उसने कहा, "मधु चला गया है"। यहाँ मधु का मतलब मधुमक्खी है और मधु कृष्ण का नाम भी है।
चीर घाट यमुना नदी के तट पर सबसे पवित्र घाटों (नीचे की तरफ सीढ़ियों की एक श्रृंखला) में से एक है। यह वह स्थान है जहाँ वृंदावन में गोपियों के वस्त्र चोरी करने की लीला श्री कृष्ण ने द्वापर युग में सम्पन्न की थी ।
देह कुंड बरसाना के पास ऊंचा गाँव में स्थित है। यह ललिता सखी का गाँव है। यहां एक बार एक ब्राह्मण ने श्री कृष्ण से कहा, मेरी बेटी विवाह योग्य है, क्या आप मुझे कुछ धन दे सकते हैं?
यहाँ जब महादेव नंद भवन में लाला के दर्शन करने गए तो यशोदा मैया ने मना कर दिया कि हमारा लला बहुत छोटा है और आपके दर्शन से डर जाएगा तो महादेव यहाँ इस आस में आसन लगा कर बैठ गए कि श्री कृष्ण हमारी सुनेंगे और दर्शन देंगे। अतः आसेश्वर कहलाए।
इस कुंड के आस-पास पीलू वृक्ष हैं जो बहुत मात्रा में फल का उत्पादन करते हैं। पीलू फलों को इकट्ठा करने के बहाने श्री राधा रानी यहाँ चंचल लीला करती हैं।
श्री रूप गोस्वामी ने एक बार विचार किया, "श्री चैतन्य महाप्रभु जी की अंततः हृदय की इच्छा को पूरा करने के लिए, मैं एक नाटक लिखूंगा ।
इस गाँव का नाम श्री राधा रानी की दादी मुखारी के नाम पर रखा गया है, जो इस स्थान पर रहती थीं और इस प्रकार गाँव को मुखारी नाम से पुकारा जाने लगा ।
राधा कुंड, गोवर्धन में एक ऐसा स्थान है जहाँ एक बहुत बड़ा इमली का पेड़ खड़ा था और यह एक जगह थी जहाँ रूप गोस्वामी ने राधा और कृष्णा की सबसे अविश्वसनीय स्विंग गड़गड़ाहट जोलाना-लीला के रूप में देखा।
एक बार होली के समय श्री राधा और श्री कृष्ण एक सिंघासन पर विराजमान थे। सखियों ने अवसर पाकर गुप्त रूप से दिव्य युगल को वस्त्र से आपस में बांध दिया।
राधा सरोवर प्राण मंत्र है - ओह राधिका सरोवर, आप देवताओं को संतुष्ट करने वाली हैं ! आप को नमस्कार, इस सरोवर में तीनों लोकों को मुक्त करने की शक्ति और क्षमता है।
यह श्री कृष्ण की वसंत रास लीला की भूमि है और उनकी प्रिय गोपियों का प्रिय स्थान है। यह रास ब्रह्मा जी की सम्पूर्ण रात्री काल तक चलती रही ।
यह कुंड, जो घने बरगद के वृक्षों से घिरा हुआ है, दिव्य युगल श्री राधा कृष्ण के मिलन का साक्षी है। यह जावत के दक्षिणी भाग में स्थित है।
लुक-लुक कुंड काम्यवन (कामवन) में स्थित है। जहाँ श्री कृष्ण,श्री राधा जी एवं सखी लुका -छिपी खेलते थे। एक बार श्री कृष्ण पहाड़ पर बैठे हुए थे