मेरो मन तौ हरि के संग गयो - श्री कुम्भनदास जी की वाणी (233)
हे सखी! मेरा मन तो अब श्री कृष्ण के संग ही चला गया है। इसमें किसी और का कोई दोष नहीं है, यह तो मेरे इन नेत्रों की ढिठाई है जिन्होंने मुझे पर-बस (श्यामसुन्दर के अधीन) कर दिया है।
अनेकनटधारी च युवा गौरोऽति शोभनः। ताबूलहस्तः स्मेरास्यो नाट सुरसिकैर्मतः॥ - देवर्षि नारद, राग निरूपणम् (114) राग नट, राग नटनारायण के पुत्र हैं। विशेषज्ञ श्रोताओं के अनुसार, वे कई नाटकीय रूप धारण करते हैं, और एक निष्पक्ष और बहुत सुंदर युवा हैं। उनकी मुस्कान आकर्षक है (पान से सने लाल होंठ) और हाथों में पान का पत्ता है। राग नट मध्य रात्री के समय गाया जाता है।
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हे सखी! मेरा मन तो अब श्री कृष्ण के संग ही चला गया है। इसमें किसी और का कोई दोष नहीं है, यह तो मेरे इन नेत्रों की ढिठाई है जिन्होंने मुझे पर-बस (श्यामसुन्दर के अधीन) कर दिया है।
हे सखि! गिरिधर पिय के हृदय में बसने वाली श्री राधिका के बदन की छवि अत्यंत सुंदर है। उनके एक अंग की शोभा के सामने तो करोड़ों चंद्रमा-सूर्य भी फीके पड़ जाते हैं।
(श्रीयुगल की सुरतान्त छवि का अंकन है।) प्रिया-प्रियतम जमुहाई लेते हुए जाग रहे हैं। उनके मद-भरे नयन चंचल हो रहे हैं। वस्त्र-अलंकार अस्त-व्यस्त हैं।
प्रीतम (श्री कृष्ण) को भक्ति से ही वश में किया जा सकता है । अपने ह्रदय से मनोहर श्याम को एक क्षण को भी नहीं भूलना चाहिए ।
हे प्यारी [राधे], लाल [कृष्ण] अलि [भँवरा] तुम्हारे बदन रूपी कमल रस पर अटक गया है । उनका तन आपके तन से मिला है, और मन आपके मन से मिला हुआ है, अब ऐसा उलझ गया है कि अकेला चल भी नहीं सकता ।
श्री सूरदास कहते हैं "यह सब भक्त के लक्षण हैं। कोई उनकी निंदा करता है तो कोई उनकी वंदना करता है, तथा कोई उनपर प्रहार कर उनका धन लेकर भाग सकता हैं।"
नव निकुंज देश की कोई सहचरी अपनी सहेली से कहती है - हे सखी ! प्रीति की अध्भुत गति का अवलोकन तो करो, जहॉ प्रिया अपने प्रियतम को प्रीति पूर्वक हृदय पर ऐसे धारण करती है जैसे कोई माला को धारण करता है ।
अरी राधा, तेरा मुख कमल चंद्रमा के समान सुन्दर है, तू इसे क्यों नहीं छुपाती। सुनो, हे श्री वृषभानु नंदिनी, उसे उजागर कर, क्यों इतने जीवों को तरसाती हो।"
मेरा मन नटवर नागर श्री कृष्ण चंद्र से मान चुका है [अर्थात् अब मैंने उनको अपना सब कुछ बना लिया है]। मैंने अगम [वेदों] और निगम [शास्त्रों] में वर्णित अनेक प्रकार के पंथों को सर्वथा त्याग कर दिया एवं समस्त जग के मोह जंजाल का भी त्याग कर दिया ।
केवल प्रेम ही प्रियतम को पाने का एकमात्र मार्ग है। भले ही आप रूप, गुण, शील तथा सुंदरता से संपन्न हों, परन्तु इन सब से प्रीतम नहीं प्रसन्न होने वाले ।
मेरे एकमात्र चिंतन व्रज के भगवान श्रीकृष्ण हैं। मुझे यश या अपयश का कोई भय नहीं है, और अगर कुछ भी कहने की आवश्यकता है, तो मैं इसे आज कहूंगा!
हे श्री राधे, यह आपकी आंखें है या बाण। इन्हें देख कर वन के मृग मोहित हो रहे हैं, तो मनुष्य की कौन कहे। आपकी आंखों में लगे काजल को देख श्री श्यामसुंदर मोहित हो रहे हैं
हे श्री राधे, आपके नयन मानो बाणों के समान हैं। कोई यदि आपके तिरछे बाण देख लेता है वो तो धरती पर गिर जाता है मानो उसके प्राण ही चले जाते हैं।