आदिवाणी

आदिवाणी श्री नित्यानंद प्रभु के शिष्य श्री रामराय द्वारा लिखित एक ब्रज भाषा का ग्रंथ है ।

12 लेख उपलब्ध हैं

  1. मोपै कहा कियौ तैं प्यारी - श्री रामराय जी, आदिवाणी (44)

    प्रियतम श्री कुंजबिहारी अपनी प्राणप्रिया श्री राधा से अत्यंत आकुल होकर कहते हैं कि हे प्यारीजू! तुमने मुझ पर ऐसा कौन सा सम्मोहन-बाण चला दिया है कि यह सघन निकुंजों में विहार करने वाला नवल श्याम सब प्रकार से तुम्हारे पूर्णतः अधीन हो गया है।

  2. प्रथम सहचरी भाव हिय - श्री रामराय जी, आदिवाणी (102.1)

    सर्वप्रथम अपने हृदय में सहचरी-भाव धारण करके स्वयं को मानसी-भाव से कुंज के द्वार पर उपस्थित करना चाहिए, जहाँ मंगलमय श्री युगल किशोर की विविध प्रकार से प्रेमपूर्वक सेवा करते हुए उनका गुणगान करना चाहिए।

  3. प्यारी देख मेरें कैसी वीरी रची - श्री रामराय जी, आदिवाणी (26)

    सखी श्री राधा से कहती है — हे प्यारी जू! देखो, मैंने कितनी सुंदर बीरी (पान) रची है। इसका फल यह होगा कि तुम्हारे अमृत-से अधरों पर लालिमा और भी गाढ़ी हो जाएगी—अर्थात् तुम्हारे लाल होठों पर यह और गहरी रंजना कर देगी।

  4. प्यारी तोहि कैसै कै मान मनाऊँ - श्री रामराय जी, आदिवाणी (37)

    हे प्यारीजू! तुम्हारे मान (रूठने) को मनाने का मैं हर संभव प्रयास कर रहा हूँ, किंतु मैं पूर्णतः विवश हो चुका हूँ। तुम्हारी राजधानी वृन्दावन में वास करते हुए हर क्षण कोई न कोई नई युक्ति गढ़ता हूँ, परंतु वह भी निष्फल ही सिद्ध हो रही है।

  5. प्यारी तोहि वुरी वान जह मान की - श्री रामराय जी, आदिवाणी (36)

    श्रीकृष्ण श्रीराधा से कहते हैं, “हे प्यारी जू! आपकी यह मान करने की आदत मेरे लिए अत्यंत कष्टदायक है”। यदि आपकी थोड़ी सी भी टेढ़ी भौंहें देख लेता हूँ, तो मेरे प्राण अति व्याकुल हो उठते हैं, अपनी सुधि-बुधि खो बैठता हूँ ।

  6. रसिकन कृष्ण प्रेमरस निधिसौं - श्री रामराय जी, आदिवाणी (60)

    अनन्य रसिकों ने श्री कृष्ण प्रेम-रस रूपी धन की साक्षात मूर्तिमान स्वरूपा अर्थात् रंगीली श्री राधा को ही सदा लाड़ लड़ाया है, जो समस्त जीवों की विविध प्रकार की प्राकृत वासनाओं का अविरल रूप से हरण करती हैं।

  7. ललित लता मन्दिर के आंगन - श्री रामराय जी, आदिवाणी (10)

    प्रातः काल के समय श्री राधा कृष्ण सुन्दर लता मंदिर के आंगन में विराजमान हैं। श्री प्रिया जी श्री कृष्ण की पीताम्बरी ओढ़े हुए हैं एवं श्री कृष्ण श्री प्रिया जी की नीली साड़ी ओढ़े हुए हैं।

  8. श्रीबृन्दावन प्यारौ प्यारी कौ - श्री रामराय जी, आदिवाणी (81)

    श्री वृंदावन धाम श्री राधा प्यारी को अत्यंत प्रिय है इसलिए श्यामसुन्दर को वृंदावन प्राणों से भी अधिक प्यारा है । निशिदिन, छिन छिन, उनका वृंदावन के प्रति प्रेम दुगना, चौगुना होकर बढ़ता रहता है क्योंकि यह राधा प्यारी का ही अभिन्न स्वरूप है ।

  9. प्यारीजू प्यारेकौं भावै सो सहज करैं - श्री रामराय जी, आदिवाणी (1)

    प्यारे श्री श्यामसुंदर को जो भाता है, वही प्यारी श्री राधा सहज में करती हैं एवं प्यारी श्री राधा को जो सदैव भाता है, वही प्यारे श्री श्यामसुंदर करते हैं ।

  10. रे मन करि श्रीवन अनुराग - श्री रामराय, आदिवाणी (93)

    रे मन! श्री वृंदावन धाम से अनुराग कर । तूने 84 लाख योनियों को पार कर मनुष्य जन्म प्राप्त किया है, इसलिए महल की टहल (श्री राधा कि निज महल में सेवा) के लिए साधनारत हो ।