श्री बिल्वमंगल ठाकुर

 श्री बिल्वमंगल ठाकुर 12 वीं शताब्दी के दक्षिण भारत के एक प्रसिद्ध संत थे जिन्होंने श्री "कृष्ण कर्णामृतम" नामक ग्रन्थ की रचना की थी।  श्री बिल्वमंगल ठाकुर जी ने वृंदावन में भजन किया एवं इनकी समाधि भी वृंदावन में ही स्थित है ।

13 लेख उपलब्ध हैं

  1. हस्तमुत्क्षिप्य यातोसि बलात्कृष्ण - श्री विल्वमंगल, श्री कृष्ण कर्णामृतम (3.97)

    हे कृष्ण, यह कौन सी बड़ी बात है कि तुम जबरदस्ती मेरा हाथ छुड़ा कर चले गये, मर्दानगी तो तुम्हारी मैं तब मानूँगा यदि मेरे ह्रदय से निकल कर दिखाओ ।

  2. प्रेमदं च मे कामदं च- श्री बिल्वमंगल, श्री कृष्ण कर्णामृतम (104)

    हे कृष्ण! तुम ही मेरा अनन्य प्रेम हो एवं मेरी इच्छा हो; मेरे ज्ञान एवं मेरा वैभव हो; मेरा जीवन एवं जीवन का आश्रय हो; तुम ही मेरे भगवान हो, अन्य कोई नहीं !

  3. अश्रान्तस्मितमरुणारुणाधरोष्ठं - श्री विल्वमंगल, श्री कृष्ण कर्णामृतम (47)

    हे मुरलीघर ! तुम्हारे वदनाम्बुज को मैं कब देखूँगा, जिसमें अनवरत स्मित है, अरुण-अरुण अघर हैं, हर्ष से स्निग्ध द्विगुणित मनोहर वेणुगीत हैं तथा जो चंचल तथा विशाल लोचनों के अपांग बीक्षण से मनोहर हैं ।

  4. निबद्धमूर्द्धाञ्जलिरेष याचे - श्री विल्वमंगल, श्री कृष्ण कर्णामृतम (30)

    हे श्रीकृष्ण ! मस्तक पर हाथों की अंजलि बाँधकर निरन्तर दीनता की उन्नति से मुक्त कण्ठ से मैं तुम से याचना करता हूँ । हे दयासागर! तुम अपने कटाक्षों की उदारता के एक कण से भी एक बार मुझे सींच दो ।

  5. जय जय जय देव देव देव - श्री बिल्वमंगल, श्री कृष्ण कर्णामृतम (108)

    हे देव तुम्हारी जय हो । जय हो । जय हो । तुम्हारा नाम दिव्य है और त्रिभुवन में मंगल करने वाला है । हे देव हे कृष्णदेव तुम्हारी जय हो, जय हो, जय हो । तुम कान, मन तथा आंखों के लिए अमृत के अवतार हो ।

  6. मयि प्रसादं मधुरैः कटाक्ष - श्री बिल्वमंगल, श्री कृष्ण कर्णामृतम (29)

    हे श्रीकृष्ण ! वंशी के नाद के अनुचर मधुर कटाक्षों से मुझ पर कृपा करो। तुम्हारे प्रसन्न होने पर इस संसार में दूसरे विषयों से क्या प्रयोजन है ? तुम्हारे अप्रसन्न होने पर इस संसार में दूसरे विषयों से क्या प्रयोजन है ?

  7. श्रृङ्गाररससर्वस्वं शिखिपिच्छविभूषणम् - श्री बिल्वमंगल, श्री कृष्ण कर्णामृतम (62)

    (समस्त) भुवनों के आश्रय (श्रीकृष्ण) का मैं आश्रय लेता हूं जो श्रृंगार रस के सर्वस्व हैं, जिन्होंने मोरपंख का भूषण धारण कर रखा है और जिन्होंने पुरुष के आकार को ग्रहण कर रखा है ।

  8. मधुरं मधुरं वपुरस्य विभोर्मधुरं - श्री बिल्वमंगल, श्री कृष्ण कर्णामृतम (62)

    इस विभु श्रीकृष्ण का मधुर भी शरीर और मधुर है । इसका मधुर वदन मधुरातिमधुर है । इसका मधुगन्धयुक्त मृदु स्मित महामधुर होने पर भी और मधुर है ।

  9. पुनः प्रसन्नेन्दुमुखेन तेजसा - श्री बिल्वमंगल, श्री कृष्ण कर्णामृतम (34)

    हे श्रीकृष्ण! प्रसन्न चन्द्रमा के समान मुख वाले तेज से मेरे सामने पुनः प्रकट होने वाली श्रीकृष्णकृपासमुद्र की उसी लीला-मुरली की नादामृत-लहरी से कब मेरी समाधि में विघ्न होगा ?

  10. मणिनूपुरवाचालं वन्दे तच्चरणं विभोः - श्री बिल्वमंगल, श्री कृष्ण कर्णामृतम (16)

    मैं उन विभु भगवान् श्रीकृष्ण के उन चरणारविन्द को प्रणाम करता हूँ जो मणिमय नूपुरों से वाचाल हैं अथवा मणि तथा नूपुरों की द्रुतगति से मुखर हैं और जिनके ललित चिह्न ब्रज की वीथियों में अंकित हैं ।

  11. श्री बिल्व मंगल ठाकुर - भजन एवं समाधि स्थल

    12 वीं शताब्दी में दक्षिण भारत के एक प्रसिद्ध संत जिन्हें श्री बिल्व मंगल ठाकुर के नाम से जाना जाता था, उन्होंने वृंदावन में इसी स्थान पर भजन किया एवं यहाँ पर ही उनकी समाधी भी है । यह स्थान गोपीनाथ बाजार में, श्री गोपीनाथ मंदिर के पास स्थित है।