श्री छीत स्वामी

श्री छीत स्वामी पुष्टिमार्ग एवं वल्लभ सम्प्रदाय के अष्टछाप कवि थे।

14 लेख उपलब्ध हैं

  1. माई री! नंद-नंदन मेरौ मन जु हर्यौ - श्री छीत स्वामी

    एक सखी अन्य सखी से कहती है — हे सखी! नंदनंदन श्रीकृष्ण ने मेरा मन चुरा लिया है। जब मैं गाय का दूध दुहने जा रही थी, तभी कृष्ण ने मेरी ओर देखकर मुस्कुरा दिया और न जाने कौन सा जादू कर दिया।

  2. पौंढे माई लालन गिरिवरधारी - श्री छीत स्वामी, श्री छीत स्वामी जी की वाणी (159)

    हे सखी, कुंज-महल के भीतर पुष्पों से सुसज्जित सुंदर सेज पर लाल गिरिधारी श्री कृष्ण पौढ़े हैं, और उनके साथ श्री राधिका प्यारी की मनोहर छवि शोभा बढ़ा रही है।

  3. आगें कृष्ण, पाछें कृष्ण, इत कृष्ण उत कृष्ण - श्री छीत स्वामी जी की वाणी (115)

    श्री कृष्ण आगे हैं, श्री कृष्ण पीछे हैं, श्री कृष्ण इधर हैं, श्री कृष्ण उधर हैं, जहाँ भी मैं देखता हूँ, वहाँ केवल श्री कृष्ण ही दिखते हैं।

  4. मोहि भरोसौ श्री गिरिराज कौ - श्री छीत स्वामी (अष्टछाप कवि)

    मुझे तो केवल श्री गिरिराज जी पर ही भरोसा है । भक्ति विहीन होकर यदि तन, मन, लगाकर कितना भी धन जोड़ा जाए अथवा कोई भी कार्य किया हो, अंततः वह किसी काम का नहीं रह जाता ।

  5. पौढ़ी श्री वृषभान किसोरी नंद नंदन के संग - श्री छीत स्वामी (अष्टछाप कवि)

    वृषभानु नंदिनी श्री राधा नंदनंदन श्री कृष्ण के संग पुष्पों से निर्मित अति कोमल सेज अंग से अंग मिलाकर विश्राम कर रहे हैं ।

  6. अहो विधना ! तो पै अचरा पसारि मांगों - श्री छीत स्वामी (अष्टछाप कवि)

    श्री छीतस्वामी परमात्मा से [विधाता से] यही आँचल पसार कर अनुग्रह की याचना करते हैं कि उन्हें सदा जन्म जमान्तर में ब्रज में ही वास मिले, एवं अहीर जाति में जन्म मिले, एवं उनका घर नन्द बाबा के घर के समीप हो, जिससे वे हर घड़ी श्यामसुंदर के दर्शन कर सकें, उनके साथ हंस-खेल सकें ।

  7. श्री छीतस्वामी की जीवनी

    श्री छीतस्वामी श्रीनाथजी के अष्ट सखाओं में से एक थे एवं पुष्टिमार्ग में अष्टछाप भक्तों में से थे। ये ब्रजवासी थे एवं इनका जन्म मथुरा में सन 1515 में चौबे परिवार में हुआ था। कालांतर में छीतस्वामी गुसाईं श्री विट्ठलनाथ जी के शरणागत हुए एवं श्रीनाथजी को पद गाकर सुनाते थे।

  8. राधिका श्याम सुन्दर को प्यारी - श्री छीतस्वामी

    श्री राधिका श्याम सुंदर की अत्यंत प्यारी हैं । श्री राधिका जू के नख सिख [नख से सिख अर्थात् प्रत्येक अंग] की माधुरी पे कोटि कोटि चंद्रमा को नयौछावर किया जा सकता है ।