धाइके जाइ जी जमुना-तीरे - श्री छीत स्वामी जी की वाणी (164)
दौड़कर यमुना के तट पर चलो। उसकी महिमा कहाँ तक वर्णित की जा सकती है? यमुना जी के नीर का स्पर्श करते ही हृदय प्रेम से सराबोर हो जाता है।
श्री छीत स्वामी पुष्टिमार्ग एवं वल्लभ सम्प्रदाय के अष्टछाप कवि थे।
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दौड़कर यमुना के तट पर चलो। उसकी महिमा कहाँ तक वर्णित की जा सकती है? यमुना जी के नीर का स्पर्श करते ही हृदय प्रेम से सराबोर हो जाता है।
एक सखी अन्य सखी से कहती है — हे सखी! नंदनंदन श्रीकृष्ण ने मेरा मन चुरा लिया है। जब मैं गाय का दूध दुहने जा रही थी, तभी कृष्ण ने मेरी ओर देखकर मुस्कुरा दिया और न जाने कौन सा जादू कर दिया।
हे सखी, कुंज-महल के भीतर पुष्पों से सुसज्जित सुंदर सेज पर लाल गिरिधारी श्री कृष्ण पौढ़े हैं, और उनके साथ श्री राधिका प्यारी की मनोहर छवि शोभा बढ़ा रही है।
श्री कृष्ण आगे हैं, श्री कृष्ण पीछे हैं, श्री कृष्ण इधर हैं, श्री कृष्ण उधर हैं, जहाँ भी मैं देखता हूँ, वहाँ केवल श्री कृष्ण ही दिखते हैं।
मेरा बल केवल दो ठौर में है । एक बल श्री हरि भक्तों का है और दूसरा बल नंदनंदन श्री कृष्ण चन्द्र का है ।
श्री राधा श्यामसुन्दर के संग, मृदुल एवं सुखद फूलों की शैया, पर विराजित हैं ।
मुझे तो केवल श्री गिरिराज जी पर ही भरोसा है । भक्ति विहीन होकर यदि तन, मन, लगाकर कितना भी धन जोड़ा जाए अथवा कोई भी कार्य किया हो, अंततः वह किसी काम का नहीं रह जाता ।
प्रीतम (श्री कृष्ण) को भक्ति से ही वश में किया जा सकता है । अपने ह्रदय से मनोहर श्याम को एक क्षण को भी नहीं भूलना चाहिए ।
वृषभानु नंदिनी श्री राधा नंदनंदन श्री कृष्ण के संग पुष्पों से निर्मित अति कोमल सेज अंग से अंग मिलाकर विश्राम कर रहे हैं ।
श्री छीतस्वामी परमात्मा से [विधाता से] यही आँचल पसार कर अनुग्रह की याचना करते हैं कि उन्हें सदा जन्म जमान्तर में ब्रज में ही वास मिले, एवं अहीर जाति में जन्म मिले, एवं उनका घर नन्द बाबा के घर के समीप हो, जिससे वे हर घड़ी श्यामसुंदर के दर्शन कर सकें, उनके साथ हंस-खेल सकें ।
श्री छीतस्वामी श्रीनाथजी के अष्ट सखाओं में से एक थे एवं पुष्टिमार्ग में अष्टछाप भक्तों में से थे। ये ब्रजवासी थे एवं इनका जन्म मथुरा में सन 1515 में चौबे परिवार में हुआ था। कालांतर में छीतस्वामी गुसाईं श्री विट्ठलनाथ जी के शरणागत हुए एवं श्रीनाथजी को पद गाकर सुनाते थे।
श्री छीतस्वामी कहते हैं कि श्याम सुंदर भी जिसके वश में हैं वही श्री वृषभानु दुलारी श्री राधिका जू हैं ।
श्री राधिका श्याम सुंदर की अत्यंत प्यारी हैं । श्री राधिका जू के नख सिख [नख से सिख अर्थात् प्रत्येक अंग] की माधुरी पे कोटि कोटि चंद्रमा को नयौछावर किया जा सकता है ।
हे विधाता, मैं तुझसे अचरा पसार (झोली फैला कर) माँगता हूँ कि जनम जन्मान्तर मुझे इस ब्रज में वास दीजिए एवं ब्रज से बाहर मत कीजिए ।