लोक लाज कुल कान की - श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा कटाक्ष, माधुर्य रस दोहावली (77)
जब तक हृदय में लोक-प्रतिष्ठा और कुल की मर्यादा की ज्वाला दहकती रहती है, तब तक श्री राधा-कृष्ण के प्रति शुद्ध प्रेम का प्राकट्य नहीं हो सकता।
माधुर्य रस दोहावली श्री ललित लड़ैती जी द्वारा रचित किशोरी कृपा कटाक्ष ग्रन्थ का एक अध्याय है जिसमें श्री राधा कृष्ण की मधुर लीलाओं से सम्बंधित दोहे संकलित हैं।
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जब तक हृदय में लोक-प्रतिष्ठा और कुल की मर्यादा की ज्वाला दहकती रहती है, तब तक श्री राधा-कृष्ण के प्रति शुद्ध प्रेम का प्राकट्य नहीं हो सकता।
भले ही कोई मनुष्य जप, योग, तपस्या, दान, धर्म, व्रत और नियमों में निरंतर लगा रहे, पर यदि हृदय में प्रभु के प्रति निष्कपट प्रेम का अभाव है, तो उसे स्वप्न में भी वास्तविक कल्याण, आंतरिक शांति और परम संतोष की प्राप्ति नहीं हो सकती।
मेरे हृदय की निरंतर यही कामना है कि मुझे श्री वृन्दावन में वास मिले, जहाँ मैं युगल सरकार श्री श्यामाश्याम की मनोहर छवि को निहारूँ और निकुंजों में उनके रसमय रास-विलास का साक्षात् दर्शन कर सकूँ।
सब रसों का सार रस, वृंदावन रस अनंत है क्योंकि यह युगल किशोर श्री राधा-कृष्ण का नित्य निवास स्थान है। स्वयं भगवान श्री हरि भी, कमलापुर (वैकुंठ) में वास करते हुए, निरंतर ब्रज वास की आशा करते हैं।
जो भी भोजन प्राप्त हो, चाहे वह शाक, पत्र, कंद अथवा फल ही क्यों न हो, उसी में संतोष कर लेना चाहिए। परंतु श्री वृंदावन धाम को कभी भी नहीं छोड़ना चाहिए, क्योंकि यह युगल विहार का सुंदर स्थल है । श्री धाम वृंदावन के वास की अद्भुत महिमा है।
जो जीव विश्राम चाहता है, वह वृंदावन धाम में निवास करे। कालिंदी (यमुना) के जल का पान करे और राधा-श्याम का नाम रटे ।
श्री वृंदावन धाम धन्य-धन्य है, यह समस्त सुखों की खान है, जहाँ गौर-श्यामल वर्ण वाले, रसिकों के जीवन-प्राण, श्री राधा-कृष्ण सदा नित्य विहार में मग्न रहते हैं।
हमें वृंदावन के रसिकों का सत्संग करके उनसे यह सीखना चाहिए कि श्री राधा कृष्ण का ध्यान कैसे करें और कैसी भावनाएँ विकसित करें। श्री ललित लड़ैती जी के अनुसार, युगल सरकार के भजन से ही जीव का कल्याण संभव है, इसके अतिरिक्त कोई अन्य उपाय नहीं है।
जो वृन्दावन की रज को छोड़कर अन्य देशों में भ्रमण करता है, मानो वह अमूल्य रत्न रूपी मनुष्य शरीर को यूँ ही खो देता है, और अंत में क्लेश को प्राप्त करता है।
हे मन, विषय भोग के सुख का त्याग कर श्री वृन्दावन धाम में वास कर। रसिकों का संग कर और मुख से "राधे श्याम" रट।
श्री राधा कृष्ण की मधुर रूप की छवि को निहार कर जिसके नेत्रों से आँसू नहीं बहते उस ह्रदय को पत्थर समान समझना चाहिए ।
मेरे हृदय में दिन-रात यही एक अभिलाषा जागृत रहे कि मैं युगल लाल की दिव्य छवि का नित्य दर्शन करता रहूँ और श्री वृंदावन धाम में अखंड वास का सौभाग्य प्राप्त करूँ। यही जीवन की परम साधना और एकमात्र कामना है।