प्यारी तेरो मानु मनावन आँई - श्री केवल राम जी, रास मान के पद (25)
हे प्यारी जू, आपके मान को दूर कर मैं आपको मनाने आयी हूँ। रसिकराज श्रीकृष्ण बार-बार मेरे चरणों में गिर रहे हैं। उन्होंने प्रेम और करुणा से प्रेरित होकर मुझे आपके पास भेजा है।
रास मान के पद श्री केवल राम जी द्वारा लिखित रास एवं मान के पदों का संग्रह है । पुष्टिमार्गीय अष्टम पीठाधीश्वर केवल राम जी श्री विठ्ठलनाथ जी के गोद लिए पुत्र श्री लाल जी के वंशज, जिन्हें अष्टम पीठाधीश की उपाधि मिली थी।
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हे प्यारी जू, आपके मान को दूर कर मैं आपको मनाने आयी हूँ। रसिकराज श्रीकृष्ण बार-बार मेरे चरणों में गिर रहे हैं। उन्होंने प्रेम और करुणा से प्रेरित होकर मुझे आपके पास भेजा है।
एक सखी, माननी श्री राधिका से कहती हैं, हे प्यारी, तुमने किस कारण अपने प्रियतम से मान किया हुआ है ? प्रियतम श्याम सुंदर तो सदा तुम्हारे अधीन रहते हैं एवं तुम्हारी ही शरण में हैं, उनके ह्रदय का ख़्याल कीजिए ।
एक सखी, माननी श्री राधिका से कहती हैं, हे प्यारी, तुम्हारे जैसा प्रियतम किसी का नहीं है। तुम ही तो लालजी (श्रीकृष्ण) का तन, मन, धन और प्राण हो, जैसे चंद्रमा की उजियारी किरणें होती हैं ।
श्री राधा कृष्ण दोनों मिलकर रास मंडल में ‘थई थई तत थई’ कर प्रेम में उमड़ कर नाच रहे हैं एवं सुंदर सुर में गान कर रहे हैं।
नवल किशोर श्री कृष्ण एवं वृषभानु दुलारी श्री राधा थेइ-थेइ करते हुए रास लीला में नृत्य कर रहे हैं, जिसमें वे एक से एक सुन्दर नविन गति प्रदर्शित करते हैं ।
श्री राधिका कुंज महल में जालीदार खिड़की के पास बैठी हुई हैं। प्रियतम श्री कृष्ण महल के अंदर प्रवेश नहीं कर पा रहे हैं, इसलिये वे बाहर खड़े होकर उनके दर्शन का इंतजार कर रहे हैं।
आज श्री गोपाल के संग प्यारी राधिका की छवि अत्यंत मनोहर लग रही है । वे दोनों मधुर गान करते हुए आ रहे हैं एवं उनकी चाल मराल के समान है ।
हे श्री राधे! प्यारो नंदलाल श्री कृष्ण आपकी प्रतीक्षा में रात भर जाग रहे हैं एवं व्याकुलता से वृंदावन की कुंजों में आपकी राह निहार रहे हैं ।
साँवरे श्री कुञ्ज बिहारी के संग बिहारिनि श्री राधा की छवि अति ही सुन्दर शोभा को प्राप्त हो रही हैं।
हे श्री राधे, मैं क्या कहूँ, मुझसे कुछ कहते नहीं बनता।हे वृषभानु नंदिनी, मैं आपकी शपथ लेकर कहता हूँ की चंद्रमा भी आपके मुख की छवि के समान सुंदरता प्राप्त नहीं कर सकता।
हे सखी, मेरो रंगीलो लाल [कृष्ण] नित्य ही रंगीली ठकुरानी श्री राधा के वश में है । श्री राधा ठकुरानी अति अगाध शोभा एवं गुणों का समुद्र है, मेरा लाल उनके पीछे पीछे रस में विभोर होकर डोलता है ।
पिय श्री श्याम सुंदर केवल “श्री राधा, श्री राधा” ही रटते हैं । वृंदावन की ठकुरानी, अगाध सुंदरता एवं दिव्य शोभा की सिंधु ही साक्षात श्री राधा ठकुरानी हैं ।