श्री केशवाचार्य

श्री केशवाचार्य, ब्रज के रसिक संत

12 लेख उपलब्ध हैं

  1. कथय कथय जिह्वे सद्‌गुणान् - श्री केशवाचार्य, गोवर्द्धन शतक (07)

    हे जिह्वा! तू श्री गिरिराज गोवर्धन के श्रेष्ठ गुणों का निरंतर वर्णन कर। हे मन! तू उनके अद्भुत स्वरूप का बार-बार ध्यान कर। हे नेत्र! तू उनकी मनोरम शोभा का दर्शन करके उसका रसपान कर, और हे मेरे शरीर! तू नित्य ही श्री गोवर्द्धन के मार्ग की पावन धूलि में प्रेमपूर्वक लुण्ठन (लोट-पोट) किया कर।

  2. गोवर्धने कृता येन प्रीतिः श्री हरिवल्लभे - श्री केशवाचार्य, गोवर्द्धन शतक (90)

    जिसने मनुष्य जन्म धारण कर भगवान् श्री कृष्णचन्द्र के प्रियतम श्री गोवर्द्धन में प्रेम किया उसने संसार में सब कुछ शुभ-कार्य सष्पादन कर लिया अर्थात् उस पुरुष का ही जन्म सफल है।

  3. केचिद्भजन्ति कृतिनो गिरिजामथान्ये - श्री केशवाचार्य, गोवर्द्धन शतक (53)

    प्रेम की तरंगों से उल्लसित गोप-सुंदरियों के चंचल हृदयों को आकर्षित करने हेतु, जब नंदनंदन श्रीकृष्ण ने अपनी वंशी को कर-कमलों में धारण कर उसका मधुर वादन प्रारंभ किया, उसी गोवर्धन में मेरा निवास हो।

  4. केचिद्भजन्ति कृतिनो गिरिजामथान्ये - श्री केशवाचार्य, गोवर्द्धन शतक (53)

    कोई कुशल जन गिरिजा (पार्वती) जी की आराधना करते हैं, कोई शिवजी की तथा कोई सूर्य-भगवान की सेवा करते हैं। कोई वह हैं जो गणेश जी की, कोई इंद्र की तथा कोई शंकर जी आदि देवताओं की आराधना करते हैं, अस्तु, जो करते हैं किया करें, मैं तो श्री गोवर्धन जी की शरण में ही जाता हूँ।

  5. सर्व साधन हीनञ्च - श्री केशवाचार्य, गोवर्द्धन शतक (95)

    हे शैल-राज श्री गोवर्धन, देखो, यद्यपि मैं सकल साधनहीन, अति दीन और कुबुद्धि हूँ, तथापि आप मेरी उपेक्षा करने योग्य नहीं हैं अर्थात्, शरणागत को आप आश्रय प्रदान कीजिए।

  6. विष्णोर्निवासमपरे त्रिपुरारि - श्री केशवाचार्य, गोवर्द्धन शतक (12)

    जो कोई अपनी सुबुद्धि के दारा विष्णुलोक में अथवा शिवलोक में निवास करना चाहता है वे भली प्रकार करें किन्तु हम तो यही चाहते हैं कि कालान्तर में जब कभी जन्म घारण करना पड़े तो यद्यपि कीट आदि देह मिले तथापि श्री गोवद्धन के निकट आस पास की भूमि में ही होवे ।

  7. अखिल जनन बीथी भुक्त नाना प्रयासै - श्री केशवाचार्य, गोवर्द्धन शतक (11)

    अनेक जन्म रूप बीथि (गलियों) भें घूमते घूमते अनेक तरह के कष्टों को भोगते हुए अनेक प्रयत्नों से किसी तरह से इस दुर्लभ मानव जन्म को मैंने प्राप्त तो कर लिया किन्तु हा, बड़े खेद का विषय है कि, तथापि दुर्भाग्य वश आज तक भी श्री गिरिराज के निकट-भूमि में निवास करने का सौभाग्य नहीं प्राप्त हुआ है !

  8. भूयादुपत्यकायामधित्त्यकायां गिरे: क्वचिद्‌ वास - श्री केशवाचार्य, गोवर्द्धन शतक (5)

    यदि मैंने अपने जीवन में विशुद्ध भाव से गुरु/भक्तों की निष्काम सेवा की हो तो श्री गिरिराज के निकट भूमि (तलहटी) में कहीं पर मेरा निवास हो ।

  9. यच्चेतसि स्फुरति नित्त्य विलास - श्री केशवाचार्य, गोवर्द्धन शतक (10)

    श्री गोवर्धन राज की जय हो जो श्री कृष्ण चंद्र का नित्य विलास धाम हैं जो समस्त केली कलाओं का निधान है । श्री कृष्ण चन्द्र के चरणों से रंजित इस धाम की रज को अपने भाल पर भाव से लगाने से ऐसे कौन से पाप हैं जो नष्ट नहीं हो सकते?

  10. नमामि गोवर्धनपादपल्लवं - श्री केशवाचार्य, गोवर्द्धन शतक (2)

    श्री गिरिराज गोवर्धन के चरणों का वंदन करता हूँ, श्री गिरिराज गोवर्धन के उज्जवल रूप का स्मरण करता हूँ, एवं वाणी से परम मंगल गोवर्धन नाम का उच्चारण करता हूँ । श्री गिरिराज गोवर्धन जी के अतिरिक्त मैं अन्य किसी और को नहीं जानता ।

  11. स्फीतां गोवर्धनाद्रे: श्रियमियशोभितो - श्री केशवाचार्य, गोवर्द्धन शतक (76)

    गोवर्धन की मनोहर शोभा के दर्शनार्थ कोटि नेत्र, गुणों को श्रवण करने के लिए कोटि कर्ण, उसके अमृतमय चरित्र गायन को कोटि जिह्वा तथा उसकी परिक्रमा के लिए कोटि चरणों की आवश्यकता है ।

  12. राधा स्कन्धे वामबाहुप्रकोष्ठं - श्री केशवाचार्य, गोवर्द्धन शतक (20)

    सुबह के समय श्री गिरिराज गोवर्धन के शिखर पर, श्री कृष्ण चंद्र बाईं भुजा को श्री राधा जू के कंधों पर डाले हुए, मंद मंद मुस्कुराते हुए, पूर्व दिशा की लालिमा को देख पुन मुस्कुराते हैं, ऐसे श्री गिरिराज मेरे इष्ट हैं ।