श्री वृंदावन माधुरी

श्री वृंदावन माधुरी वृंदावन धाम की माधुरी को समर्पित ग्रंथ है जिसे श्री रूपरसिक देवाचार्य, वृंदावन के एक रसिक संत, जिन्हें निम्बार्क संप्रदाय के श्री हरिव्यास देवाचार्य के शिष्य द्वारा रचित है।

14 लेख उपलब्ध हैं

  1. ऐसौ वृंदाविपिन है, सर्वस रस को सार - श्री रूपरसिक देवाचार्य, श्री वृंदावन माधुरी (15)

    यह श्री वृन्दावन ऐसा दिव्य और अनूठा धाम है, जहाँ समस्त रसों का सार—प्रिया-प्रियतम का नित्य विहार रस—हर क्षण बरसता रहता है।

  2. वृंदावन को नाम सुनि, जिनकें हियैं हुलास - श्री रूपरसिक देवाचार्य, श्री वृंदावन माधुरी (32)

    “श्री वृंदावन” का नाम सुनते ही जिनका हृदय प्रेम से उल्लसित हो जाता है, ऐसे महान रसिक संतों का संग करना ही सबसे उत्तम है।

  3. वृंदावन मैं रहन की, ऐसि रहैं मन मांहि - श्री रूप रसिक देवाचार्य, श्री वृंदावन माधुरी (73)

    मन में ऐसा अटल संकल्प रखकर श्री वृंदावन में निवास करना चाहिए कि चाहे शरीर खंड-खंड हो जाए, फिर भी इस पावन धाम का त्याग किसी भी परिस्थिति में न किया जाए।

  4. श्री वृंदावन महातम, समझि लेहु मन मित्त - श्री रूपरसिक देवाचार्य, श्री वृंदावन माधुरी (24)

    हे मेरे मन-मित्र! तू श्री वृन्दावन के महात्म्य को भली-भाँति समझ ले। यह ऐसा मंगलमय धाम है कि स्वयं श्री हरि भी इसे मंगलरूप जानकर निरंतर इसकी वंदना करते रहते हैं; अतः तू भी इसकी महिमा का आदर कर।

  5. आदि अंत जाको नहीं, माया कों न प्रवेश - श्री रूपरसिक देवाचार्य, श्री वृंदावन माधुरी (29)

    जिसका न आदि है और न अंत, जहाँ माया का प्रवेश भी नहीं होता—वही श्री धाम वृन्दावन इस पृथ्वी पर प्रकट होकर विराजमान है।

  6. वृंदावन यश सुनन की, जाकैं रुचि नहिं होइ - श्री रूपरसिक देवाचार्य, श्री वृंदावन माधुरी (31)

    जिस व्यक्ति को वृंदावन की महिमा सुनने में रुचि नहीं होती, उसका संग तुरंत छोड़ देना चाहिए, क्योंकि ऐसे व्यक्ति का संग करना ही महत्त अपराध है जो आध्यात्मिक पतन का कारण बन सकता है।

  7. कोटि कोटि वैकुंठ की, प्रभुताइ धौं कौन - श्री रूपरसिक देवाचार्य, श्री वृंदावन माधुरी (28)

    करोड़ों-करोड़ों वैकुंठोंकी प्रभुता भी जिसके समक्ष हेय प्रतीत होती है, ऐसा श्री धाम वृन्दावन ही रसिकों का साक्षात् रस-स्वरूप निवास-स्थल है।

  8. कोटि कोटि सुकदेव से, कोटि कोटि जयदेव - श्री रूपरसिक देवाचार्य, श्री वृंदावन माधुरी (56)

    कोटि कोटि शुकदेव एवं कोटि कोटि जयदेव इत्यादि भी जिस वृंदावन धाम के नित्य नवीन गुण का वर्णन करते हैं परंतु उसका पूर्ण रहस्य आज तक नहीं जान पाए ।

  9. चारि वेद षदशास्त्र, अष्टादश जु पुरान - श्री रूपरसिक देवाचार्य, श्री वृंदावन माधुरी (80)

    चारों वेदों, छहों शास्त्रों और अठारहों पुराणों के समस्त सार का भी सार यदि कुछ है, तो वह श्री वृन्दावन का ध्यान ही है।

  10. ब्रह्मादिक वंछित रहैं, वृंदावन रज आंहि - श्री रूपरसिक देवाचार्य, श्री वृंदावन माधुरी (33)

    श्री वृन्दावन-धाम की रज की ब्रह्मादिक भी वांछा करते हैं। श्री राधा-महारानी की कृपा के बिना, इस वृन्दावन की लीला का तनिक भी ध्यान-मात्र भी किसी के हृदय में प्रकट नहीं हो सकता।

  11. उपमा वृंदाविपिन की, देवे को नहिं ओक - श्री रूपरसिक देवाचार्य, श्री वृंदावन माधुरी (27)

    श्री वृन्दावन धाम, जहाँ श्री श्यामा-श्याम नित्य-विहार-परायण हैं, उस नित्य धाम की उपमा किसी से भी देना असम्भव है; जिसकी एक कण-मात्र की सुन्दरता से ही सर्वोपरि गोलोक धाम भी हेय प्रतीत होता है।

  12. जो कदाचितन ना बसै, तौ निज मनहिं बसाय - श्री रूपरसिक देवाचार्य, श्री वृंदावन माधुरी (46)

    यदि किसी कारणवश शरीर से (वृन्दावन में) वास न हो सके, तो अपने मन को ही वहाँ बसा लेना चाहिए। महान कवियों और संतों का कहना है कि इसमें लेशमात्र भी झूठ नहीं है (अर्थात मन से वहाँ रहना भी उतना ही फलदायी है)।

  13. श्री वृंदावन माधुरी कैसे कैं कहि जाइ - श्री रूपरसिक देवाचार्य, श्री वृंदावन माधुरी (26)

    श्री वृन्दावन की माधुरी का वर्णन किस प्रकार किया जाए? जिसका वर्णन करते-करते सहस्रमुखी शेषनाग भी थक गए और श्री ब्रह्मा जी भी उसका पार न पा सके।

  14. कोटिक तीरथ न्हाइप - श्री रूपरसिक देवाचार्य, श्री वृंदावन माधुरी (72)

    चाहे कोटि-कोटि तीर्थों में स्नान करो और चाहे करोड़ों उपाय कर लो, परन्तु श्री राधा की सहचरी बनकर ही वृन्दावन का पूर्ण रस प्राप्त होता है।