सिद्धांत के कवित्त-सवैया [श्री बिहारिन देव जी की वाणी]

सिद्धांत के कवित्त-सवैया, ग्रंथ श्री बिहारिन देव जी की वाणी में श्री बिहारिन देव जू द्वारा लिखित सिद्धांत के कवित्त एवं सेवैया का संकलन है। रचैयता: श्री बिहारिन देव जू

17 लेख उपलब्ध हैं

  1. पिता सुत बंधु कहा सम्बंध - श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के कवित्त-सवैया (35)

    हे भाई! यह सर्वथा अकाट्य सिद्धांत है कि इहलोक-परलोक दोनों में ही प्रेम के बिना कोई नाता नहीं हुआ करता। इस संसार में माता, पिता, पुत्र और भ्राता आदि के जितने भी नाते हैं, वे मूलतः स्वार्थ की नींव पर टिके हैं। यहाँ वास्तविक निस्वार्थ प्रेम की सुगंध तक नहीं है, इसलिए केवल अज्ञानी लोग ही इन संबंधों में उलझते हैं।

  2. उद्धव आदि ब्रह्मादिक दुर्लभ - श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के कवित्त-सवैया (61)

    श्री ब्रज की रज का प्रभाव अत्यंत अलौकिक और विलक्षण है। इसका गुणगान स्वयं श्री शुकदेव परमहंस जी ने करते हुए कहा कि यह रज उद्धव, ब्रह्मा और अन्य देवों के लिए भी दुर्लभ है। स्वयं श्रीराधा-कृष्ण ने अपने श्रीमुख से इस रज की महानता को स्वीकार किया है, और उसकी साक्षी स्वयं श्री शेषनाग ने दी है।

  3. कोऊ विद्या विधि वेद बँध्यौं बल - श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के कवित्त-सवैया (20)

    कोई तो विद्या, वेद, विधि-विधान में, कोई धन, धर्म, कर्मकांड आदि कार्यों के जालों में जकड़े हुए हैं। कोई यम-नियम, संयम-व्रत तथा जप-तप आदि में, तो कोई-कोई उदासीन पथ में ही भ्रमते डोलते हैं।

  4. श्रीबिहारी बिहारिनि कौ जस गावत - श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के कवित्त-सवैया (109)

    जो जीव श्री बिहारी-बिहारिनी का अनन्य भाव से प्रेम में भरकर यशोगान करता है, उस पर अनन्य नृपति रसिक शिरोमणि स्वामी श्री हरिदास जी अत्यंत रीझकर, विवश होकर, अपना सर्वस्व न्यौछावर कर देते हैं।

  5. अम्बर सम्बर बास बसे - श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के कवित्त-सवैया (110)

    जैसे घनघोर बादल आकाश में छा जाते हैं और फिर जल बरसाते हैं। यद्यपि वह जल नदियों को उमड़ाकर उनके किनारों और टीलों को ढहा देता है, फिर भी वह पुल के नीचे से होकर ही प्रवाहित होता है। उसी प्रकार श्री लालजी (श्री कृष्ण) अपनी प्रेम रूप माधुरी से भरकर, समस्त मर्यादाओं को तोड़ते हुए सतत चलते हैं।

  6. काहू कै पूजा को आस - श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के कवित्त-सवैया (12)

    कोई तो पूजा में ही सतत आशा लगाये हुए है, कोई बेचारे इस लोक एवं स्वर्ग आदि के विषय विलास लालसाओं में लगे हुए हैं। कोई घर में, कोई जहां तहाँ वन में जाकर नाना प्रकार के श्रम कर रहा है।

  7. बारक श्रीहरिदास विलोकत - श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के कवित्त-सवैया (76)

    श्री स्वामी हरिदास जी की कृपा-भरी दृष्टि से एक बार निहार लेने पर साधक सर्वोपरि नित्यबिहार रस को सहजता से ऐसे प्राप्त कर लेता है, जैसे तेल की बूंद सहज ही समुद्र में तैरती हुई पार चली जाती है।

  8. राख्यौ बंस बिहार कौ - श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के कवित्त-सवैया (27)

    रसिक अनन्य चूड़ामणि श्री स्वामी हरिदास ने इस संसार में प्रकट होकर नित्य विहार की अखंड उपासना को प्रवाहित किया है। उनके बिना ऐसा कौन है जिन्होनें अपने इष्ट (श्यामा कुंजबिहारी) के प्रति ऐसी अनन्य उपासना का उपदेश किया है।

  9. नित्यविहार अधार दुरयौ - श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के कवित्त-सवैया (31)

    श्री बिहारिन देव जी कहते हैं कि सबका सार रस यह नित्य विहार रस सबसे परे की वस्तु है जो नित्य विहारिणी जू (राधा रानी) के निज महल में एक मात्र सहचरी भाव से ही उपलब्ध होता है।

  10. श्री हरिदास के गर्व भरे - श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के कवित्त-सवैया (111)

    हम श्री हरिदास के गर्व में भरे हैं, एवं अनन्य भाव से प्रिया प्रियतम के नित्य विहार रस, जो महा मधुर रस का सार है, उसको ही सतत पान करते हैं। जो रसिक जन ठौर-ठौर का रस पीकर आनंद मान रहे हैं, वे इस रस के आनंद को देखकर औसान ख़ता (निस्तब्ध) रह जाते हैं।

  11. जप संजम नेम निषेध विधी व्रत - श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के कवित्त-सवैया (34)

    कोई व्यक्ति विभिन्न प्रकार के नेम जैसे जप, तप, व्रत, संयम, विधि-निषेध का पालन तभी तक कर सकता है, जब तक उसके हृदय ने विशुद्ध प्रेम रस का स्पर्श नहीं किया है।

  12. बांके विरदनि विदित बिहारी - श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के कवित्त-सवैया (28)

    श्री बिहारीजी अपने 'बाँके' इस विरद से प्रसिद्ध हैं। यद्यपि श्री बांके बिहारी के अंश से ही समस्त अवतार होते हैं तथापि नित्य विहार लीला आस्वादन हेतु श्री बिहारी जी वपुः धारण करते हैं।

  13. सर्वोपरि कुँजबिहारिनी रानी

    श्री राधा सर्वोच्च रानी हैं। यद्यपि श्री कृष्ण ब्रज के राजा हैं, लेकिन वह उनके द्वारा शासित हैं और उनकी सर्वोच्च रानी श्री राधा हैं।

  14. सर्वोपरि कुँजबिहारिनी रानी - श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के कवित्त-सवैया (110)

    अकेले श्री राधा और राधा सर्वोच्च रानी हैं, जो निकुंज में हमेशा के लिए रहती है। यद्यपि श्री कृष्ण ब्रज के राजा हैं, लेकिन वह उनके द्वारा शासित हैं और उनकी सर्वोच्च रानी श्री राधा हैं ।