श्री वल्लभ दास
श्री वल्लभ दास, ब्रज के एक रसिक संत थे जो पुष्टिमार्ग एवं वल्लभ सम्प्रदाय से समन्धित थे।
13 लेख उपलब्ध हैं
इन नैनन की वानि बुरी है - श्री वल्लभ दास
श्री कृष्ण के नैनों के बाण की अद्भुत गति है, जब यह बाण ह्रदय को लगते हैं, तो ह्रदय को शांति और सुकून मिलता है। परंतु इसके बिछुड़न पर ह्रदय में अपार पीड़ा उत्पन्न होती है, और एक क्षण के लिए भी शांति नहीं मिलती।
मथुरा प्रभु ने ब्रजवास दियो - श्री वल्लभ दास
मथुरा के प्रभु ने हमें बहुत कृपा करके ब्रजवास प्रदान किया है, जिसके समान कोई परम-पावन वास नहीं है।
भरोसो वल्लभ ही को राखो - श्री वल्लभ दास
अपना भरोसा केवल वल्लभ (श्री कृष्ण) में रखें। आपके सभी प्रयास एक क्षण में पूरे हो जाएंगे, बस उनकी महिमा का ही गान करें।
बंदौ श्री पद पद्म उदार - श्री वल्लभ दास
श्री राधारानी के उदार चरण कमलों कि मैं वंदना करता हूँ।
बैठे हरि राधा संग, कुंजभवन अपने रंग - श्री वल्लभ दास
श्री कृष्ण, प्रेम रंग में सराबोर होकर, श्री राधा के साथ कुंज भवन में बैठे हैं और होठों पर मुरली को लगाकर राग सारंग गा रहे हैं ।
दीनौ ब्रजवास हुलास सो मोहि - श्री वल्लभ दास जी
हे प्रभु, ऐसी कृपा हो कि मुझे सदा ब्रज वास उल्लास पूर्वक (आपकी रूप माधुरी का पान करते हुए) मिले एवं मैं सदा आपकी वेणु की तान से मोहित हुआ करूँ।
श्याम श्याम रटते रहौ - श्री वल्लभ दास जी
मैं दिन-रात, आठों याम “श्याम-श्याम” नाम का जप करता रहूँ और उनके चरणों की रज को अपने मस्तक पर धारण करूँ। मुझे उस निराकार ब्रह्म से कोई प्रयोजन नहीं है।
नहिं ब्रह्म सों काम क़छु हमको - श्री वल्लभ दास जी
न हमें ब्रह्म से कोई काम है, न ही वैकुंठ से कुछ लेना-देना; हम तो वैकुंठ की राह की ओर देखना भी नहीं चाहते।
दास गोपाल वल्लभ की स्वामिनी बस कीने गिरधारी
श्री वल्लभ दास जी कहते हैं कि मेरी स्वामिनी श्री राधा रानी ने गिरिधारी [कृष्ण] को पूर्ण रूप से अपना वश में कर रखा है ।
आठों भादों की उजियारी - श्री वल्लभ दास जी
आज श्री राधिका के प्राकट्य का आठवाँ दिन है, भादों का महीना है, और बहुत ही उजाले वाला दिन है क्यूँकि रावल में वृषभानु कुँवरी श्री राधा का प्राकट्य हुआ है ।
नहिं ब्रह्म सों काम कछु हमको - ब्रज के दोहे
हमको ब्रह्म [भगवान] से कोई काम नहीं, न ही हमें वैकुंठ से कुछ लेना देना है, हम वैकुंठ की राह को देखते भी नहीं। हमारी इतनी ही आशा है की ब्रज की रज में हम भी एक कण होकर [रज] बनकर मिल जाएँ, यही प्रीति की रीति हमें निभानी है।
बल्लभ कृष्ण जदपि सुख सागर, प्रिया बिना सब फीकौ
श्री वल्लभदास कहते हैं, "यदपी भगवान श्रीकृष्ण समस्त सुख सागर हैं, लेकिन श्री राधारानी के बिना, उनका रस, आनंद इत्यादि बेस्वाद और फीका हैं।"
मोहि अति लागत श्री बन नीकौ - श्री वल्लभ दास जी
मुझे श्री वृंदावन अति प्रिय है ! अत्यंत सुंदर फूल खिल रहे हैं, चारों तरफ से सुगंध आ रही है और भ्रमरों की गुंजार से सारा वातावरण गूंज रहा हैं। तोते और बुलबुल मधुर गान कर रहे हैं और हिरण समूह विचरण कर रहे हैं और पक्षी चारों ओर हैं।