श्री वल्लभ दास

श्री वल्लभ दास, ब्रज के एक रसिक संत थे जो पुष्टिमार्ग एवं वल्लभ सम्प्रदाय से समन्धित थे।

13 लेख उपलब्ध हैं

  1. इन नैनन की वानि बुरी है - श्री वल्लभ दास

    श्री कृष्ण के नैनों के बाण की अद्भुत गति है, जब यह बाण ह्रदय को लगते हैं, तो ह्रदय को शांति और सुकून मिलता है। परंतु इसके बिछुड़न पर ह्रदय में अपार पीड़ा उत्पन्न होती है, और एक क्षण के लिए भी शांति नहीं मिलती।

  2. आठों भादों की उजियारी - श्री वल्लभ दास जी

    आज श्री राधिका के प्राकट्य का आठवाँ दिन है, भादों का महीना है, और बहुत ही उजाले वाला दिन है क्यूँकि रावल में वृषभानु कुँवरी श्री राधा का प्राकट्य हुआ है ।

  3. नहिं ब्रह्म सों काम कछु हमको - ब्रज के दोहे

    हमको ब्रह्म [भगवान] से कोई काम नहीं, न ही हमें वैकुंठ से कुछ लेना देना है, हम वैकुंठ की राह को देखते भी नहीं। हमारी इतनी ही आशा है की ब्रज की रज में हम भी एक कण होकर [रज] बनकर मिल जाएँ, यही प्रीति की रीति हमें निभानी है।

  4. मोहि अति लागत श्री बन नीकौ - श्री वल्लभ दास जी

    मुझे श्री वृंदावन अति प्रिय है ! अत्यंत सुंदर फूल खिल रहे हैं, चारों तरफ से सुगंध आ रही है और भ्रमरों की गुंजार से सारा वातावरण गूंज रहा हैं। तोते और बुलबुल मधुर गान कर रहे हैं और हिरण समूह विचरण कर रहे हैं और पक्षी चारों ओर हैं।