आदि वरहा पुराण

वराह पुराण हिंदू धर्म का एक पौराणिक पुराण है जिसमें भगवान वराह ने भक्ति सम्बंधित उपदेश दिए हैं ।

27 लेख उपलब्ध हैं

  1. अपि कीटः पतंगो वा तिर्यग्योनिगतोऽपि वा - वराहपुराण, मथुरा महात्म (169.34)

    मथुरा (ब्रज मण्डल) में जो मृत्यु को प्राप्त करता है वह चाहे कीड़ा-मकौड़ा क्यों न हो, वह भी भगवद् स्वरूप को प्राप्त हो जाता है।

  2. यदिक्ष्छेत् परमांसिद्धिं संसारस्य च मोक्षणम् - आदि वराह पुराण

    जो व्यक्ति भव बन्धन से मुक्ति एवं भगवद् प्रेम रूप परमा सिद्धि की प्राप्ति की इच्छा करता है, उसे मन, वचन, कर्म से नित्य मथुरा (ब्रज) का गान करना चाहिए।

  3. उत्तरे हरिदेवस्य दक्षिणे कालियस्य तु - वराहपुराण, मथुरा महात्म (156.18)

    जहां उतर में श्री कृष्ण दक्षिण में कालियनाग का निवास है, इन दोनों देव स्थलों के मध्य प्रान त्यागने से पुनर्जन्म नहीं होता । यह स्थान वृंदावन में कालीदह के समीप स्थित है ।

  4. मथुरायाः परं क्षेत्रं त्रैलोक्ये न च विद्यते - वराहपुराण, मथुरा महात्म (169.1)

    भगवान कहते हैं: मथुरा [ब्रज मंडल] सर्वश्रेष्ठ है जो तीनों लोकों में कहीं नहीं है । हे देवी, मैं यहाँ सर्वदा (हर क्षण) निवास करता हूँ ।

  5. ये वसंति महाभागे मथुरामितरे जनाः - वराहपुराण, मथुरा महात्म (152.20)

    हे पृथिवी! जो भाग्यशाली जन ब्रज मंडल में निवास करते हैं वे मेरे कृपा प्रसाद से परम सिद्धि को प्राप्त होते हैं, इसमें कोई संशय नहीं ।

  6. चतुर्वेदं परित्यज्य माथुरं पूजयेत्सदा - वराहपुराण, मथुरा महात्म (165.66)

    चारों वेदों के ज्ञाता को छोड़ कर बृजवासी का सदा अधिक सम्मान करना चाहिए । पृथ्वी पर सिद्ध, भूत, और सभी देवता ब्रज वासी के दर्शन के लिए आते हैं ।

  7. तत्र स्नात्वा च पीत्वा च माथुरं लभते फलम् - वराहपुराण, मथुरा महात्म (154.34)

    जो ब्रज में स्नान, यहाँ का निर्मल जन पान करते हैं वह उत्तम फल प्राप्त करते हैं । यहाँ प्राण त्यागने से मेरे लोक की प्राप्ति होती है ।

  8. न विद्यते च पाताले नान्तरिक्षे न मानुषे - आदि वराह पुराण (153.48)

    श्री कृष्ण कहते हैं : हे वसुंधरा, इस लोक में, पाताल में, एवं अंतरिक्ष में या कहीं पर भी मुझे ब्रज मंडल से अधिक प्रिय स्थल कुछ भी नहीं है ।

  9. वृन्दावनं द्वादशकं वृन्दया परिरक्षितम् - आदि वराह पुराण (153.48)

    श्री कृष्ण कहते हैं: हे पृथ्वी देवी! यह बारहवां वन वृंदावन, वृंदादेवी द्वारा संरक्षित है और सभी पापों का नाश करने वाला है और मुझे यह अत्यंत प्रिय है।