तिष्ठेद्युगसहस्रं तु पादेनैकेन वराहपुराण, मथुरा महात्म (165.60)
जो मनुष्य एक हजार युगों तक एक पैर पर खड़ा रहता है (तपस्या करके), उससे कहीं अधिक फल मथुरा (ब्रज) निवासी प्राप्त करता है ।
वराह पुराण हिंदू धर्म का एक पौराणिक पुराण है जिसमें भगवान वराह ने भक्ति सम्बंधित उपदेश दिए हैं ।
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जो मनुष्य एक हजार युगों तक एक पैर पर खड़ा रहता है (तपस्या करके), उससे कहीं अधिक फल मथुरा (ब्रज) निवासी प्राप्त करता है ।
मथुरा (ब्रज मण्डल) में जो मृत्यु को प्राप्त करता है वह चाहे कीड़ा-मकौड़ा क्यों न हो, वह भी भगवद् स्वरूप को प्राप्त हो जाता है।
मथुरा [ब्रज मंडल] की रक्षा के लिए स्वयं भगवान शिव क्षेत्रपाल रूप से विराजमान हैं जिनके दर्शन करने से मेरे धाम के दर्शन का फल मिलता है।
सातों द्वीपों में स्थित तीर्थों का भ्रमण करने से जो फल प्राप्त होता है, उससे अधिक फल, मथुरा (ब्रज मंडल) भ्रमण से ही प्राप्त हो जाता है ।
जो व्यक्ति भव बन्धन से मुक्ति एवं भगवद् प्रेम रूप परमा सिद्धि की प्राप्ति की इच्छा करता है, उसे मन, वचन, कर्म से नित्य मथुरा (ब्रज) का गान करना चाहिए।
जहां उतर में श्री कृष्ण दक्षिण में कालियनाग का निवास है, इन दोनों देव स्थलों के मध्य प्रान त्यागने से पुनर्जन्म नहीं होता । यह स्थान वृंदावन में कालीदह के समीप स्थित है ।
भगवान कहते हैं: मथुरा [ब्रज मंडल] सर्वश्रेष्ठ है जो तीनों लोकों में कहीं नहीं है । हे देवी, मैं यहाँ सर्वदा (हर क्षण) निवास करता हूँ ।
समस्त तीर्थों में मथुरा (ब्रज मंडल) ही सर्वश्रेष्ठ है क्यूँकि यहाँ पर श्री कृष्ण ने पग पग पर दिव्य क्रीड़ा की है ।
मनोहर नाम श्री “राधे" नित्य श्री कृष्ण भगवान् जाप करते हैं, इसी नाम को जो मनुष्य ले उसके अनेक तापों से श्री राधिका रक्षा करती हैं।
ब्रज वासी भगवान [विष्णु] के ही रूप हैं, केवल ज्ञानी जन ही उनका दर्शन कर सकते हैं, अज्ञानी नहीं।
हे पृथिवी! जो भाग्यशाली जन ब्रज मंडल में निवास करते हैं वे मेरे कृपा प्रसाद से परम सिद्धि को प्राप्त होते हैं, इसमें कोई संशय नहीं ।
चारों वेदों के ज्ञाता को छोड़ कर बृजवासी का सदा अधिक सम्मान करना चाहिए । पृथ्वी पर सिद्ध, भूत, और सभी देवता ब्रज वासी के दर्शन के लिए आते हैं ।
अन्य दूर देशों से आकर जो मनुष्य ब्रज की परिक्रमा करते हैं उनके दर्शन से ही अन्य मनुष्य भी पाप रहित हो जाते हैं ।
जिसने केशव नगरी मथुरा [ब्रज] की परिक्रमा कर ली, उसने सातों द्वीपों में स्थित तीर्थों का भ्रमण कर लिया (ब्रज का अतिशय महत्व है ।) ।
जो ब्रज में स्नान, यहाँ का निर्मल जन पान करते हैं वह उत्तम फल प्राप्त करते हैं । यहाँ प्राण त्यागने से मेरे लोक की प्राप्ति होती है ।
हे वसुधे, वृंदावन भ्रमण तथा गोविंद के दर्शन करके नर यमपुरी गमन नहीं करते, अपितु पुण्यात्मा पुरुषों की गति को प्राप्त करते हैं ।
हे महाभागे, जो जन केवल ब्रज में निवास मात्र ही करता है, वे भी मेरी कृपा से परम सिद्धि को प्राप्त करते हैं, इसमें कोई संदेह नहीं है ।
श्री कृष्ण कहते हैं : हे वसुंधरा, इस लोक में, पाताल में, एवं अंतरिक्ष में या कहीं पर भी मुझे ब्रज मंडल से अधिक प्रिय स्थल कुछ भी नहीं है ।
श्री कृष्ण कहते हैं: हे पृथ्वी देवी! यह बारहवां वन वृंदावन, वृंदादेवी द्वारा संरक्षित है और सभी पापों का नाश करने वाला है और मुझे यह अत्यंत प्रिय है।
मेरा ब्रज-मण्डल 20 योजन (80 कोस) का है, जिसके यत्र-तत्र स्थित तीर्थों में स्नान करके मनुष्य सब पातकों से मुक्त हो जाता है।