arth
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लोग कुटुम सुख अर्थ अनन्तहि - श्री हित किशोरी लाल, राधा सुधा निधि स्तव (32)
मैंने लोक-परलोक, परिवार के सुख और अनन्त भौतिक कामनाओं को दूर से ही त्याग दिया है। इतना ही नहीं, जप, व्रत तथा परमार्थ सम्बन्धी समस्त श्रेष्ठ साधनों से भी दीर्घकाल तक अभ्यास करने पर निराश होकर उन्हें छोड़ दिया है।
धर्म अर्थ फल काम मोक्ष सब दूर विराजैं - श्री हित किशोरी लाल, राधा सुधा निधि स्तव (77)
धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—ये उत्तम चार पुरुषार्थ यदि जगत में अत्यन्त उत्कृष्ट माने भी जाते हों, तो वे भले ही बने रहें। मुझे तो उनकी व्यर्थ चर्चा करने की भी तनिक अभिलाषा नहीं है।
राम इन्है सब कहत हैं ताको अर्थ रसाल - श्री रामसखीजी महाराज, श्री भक्तिरस मंजरी
सब लोग जिन्हें “राम” कहते हैं, उसका वास्तविक अर्थ रसिकों की दृष्टि में अत्यन्त मधुर रस से भरा हुआ है। “रा” में श्री राधिका हैं और “म” में मनमोहन लाल (श्रीकृष्ण) विद्यमान हैं।
रा कहे भव भीर घटै अरु - श्री प्रियादास
“रा” का उच्चारण करने से संसार का भय कम हो जाता है, और समस्त कष्ट एवं बाधाएँ स्वतः ही दूर हो जाती हैं।
धर्म अर्थ काम मोक्ष सब सुख के दाता - श्री चतुर्भुजदास जी
धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—इन चारों पुरुषार्थों सहित समस्त सुख प्रदान करने वाले श्री गोवर्धनधर प्रभु श्रीकृष्ण ही गोकुल के त्राता और भक्तों के रक्षक हैं; अतः उनकी ही शरण ग्रहण करनी चाहिए।
जो सुख होत गोपालहिं गायैं - श्री सूरदास, सूरसागर
श्री कृष्ण का प्रेमपूर्वक कीर्तन करने से जो सुख (रस) प्राप्त होता है, वह जप, तपस्या और करोड़ों तीर्थों में स्नान करने से भी नहीं प्राप्त होता ।
वेषधारी हरि के उर सालै - श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रन्थ (पूर्वार्ध) (4)
श्रीहरि के भक्तों का वेश बनाकर भी जो व्यक्ति (खेल तमाशा दिखाने वाले) नट की तरह लोभ, पाखण्ड और कपट के सहारे इंद्रिय सुखों की प्राप्ति और उदर पूर्ति में लगे रहते हैं, वे हमारे हृदय को (अथवा श्रीहरि के हृदय को ) बहुत चोट पहुँचाते हैं ।
श्री ब्रजवासीदास जी की जीवनी
रसिक भक्त कवि श्री ब्रजवासीदास जी परम विरक्त एवं सांसारिक प्रचार-प्रपंच से सर्वदा दूर रहने वाले सिद्ध भक्त थे। निरन्तर श्रीराधा माधव का चिन्तन एवं उनका ही गुणानुवाद वर्णन इनका प्रमुख कार्य था।
राधाकृष्णेति हे गोप ये जपन्ति पुन: पुन: - गर्ग संहिता, गोलोक खंड (15.71)
जो मनुष्य श्री “राधा कृष्ण” यह बारम्बार रटता है उन को चारों पदार्थ धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष का क्या कहना साक्षात श्री कृष्ण चंद्र भगवान ही मिल जाते हैं ।
श्री सूरदास जी की जीवनी
Surdas's poetry is full of unique utterances and nectarine rhymes with beautiful alliteration. The letters and the word configuration are beautifully placed. The love he raised at the beginning of the poem was followed till the end.
हमारे तीरथ कौन करे - श्री कृष्णदास, श्री कृष्णदास अधिकारी जी की वाणी (1094)
हम अब कौन सा तीर्थ भ्रमण करें क्यूँकि यहाँ ब्रज में घट में गंगा, घट में यमुना इत्यादि का निवास है, अब काशी भी क्यूँ भटकते हुए फिरें?
भजन-महल में निकसत नाहिंन - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, जीव दशा (35)
भागवत धर्म की श्रेष्ठता यह है कि भगवान् का भजन करने वाला भक्त भजन रूपी महल में ही रहता है उसे वहाँ से निकलने की न इच्छा होती है और न ही उसे अवकाश है। उसके हृदय में तो श्री हरि-चरणों की अचल प्रीति निवास करती है। ऐसे भजनानन्दी भक्त के हृदय से काम, क्रोध, लोभ, मद और मत्सर निकल कर न जाने कहाँ रसातल में पलायन कर जाते हैं, सामने आने का साहस नहीं कर पाते हैं। [1]
श्री बिहारी दास जल जंतु ज्यौं - श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (131)
श्री बिहारिनदास जी कहते हैं कि जैसे जल के बिना मछली अपने प्राण त्याग देती है, उसी प्रकार श्री श्यामा-श्याम का नित्य-विहार ही मेरे जीवन के प्राण हैं; उसके बिना मेरी कोई दूसरी गति नहीं है।
धर्माद्यर्थ चतुष्टयं विजयतं किं तदवृथा वार्त्तया - श्री राधा सुधा निधि (77)
धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष ये उत्तम चार फल यदि विश्व में उत्कृष्टता को प्राप्त हैं तो भले ही रहें, हमें इनकी व्यर्थ चर्चा से क्या और ईश्वर की उस एकान्त भक्ति-योग-पदवी भी रहे हमें उससे भी क्या मतलब, अर्थात् भक्ति-योग का आदर तो करते हैं पर उससे भी क्या लेना-देना है हमारे चित्त को तो श्रीवृन्दावन की सीमा में विराजमान् एक घनीभूत आश्चर्यरूपा किशोरी-मणि (श्री राधा) के कैंकर्य रसामृत के अतिरिक्त और कुछ भी अच्छा नहीं लगता।
दे दो निज सेवा प्यारी, नहीं चहत पदरथ चारी -जगदगुरु श्री कृपालु जी महाराज, ब्रज रस माधुरी
हे राधा रानी, मुझे केवल और केवल अपनी निज सेवा दीजिये, मैं किसी अन्य चार कोष (धर्म, अर्थ - संपत्ति, काम - सांसारिक इच्छाएँ और मोक्ष - मुक्ति) की कामना नहीं करता।
मोहिं तो भरोसो है तिहारो री किशोरी राधे - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, दैन्य माधुरी (77)
हे रासेश्वरी राधे! मुझे तो एकमात्र तुम्हारा ही अवलम्ब है। मैं जिस कोटि का पतित हूँ, उसे तुम्हारे सिवा और कोई भी सांसारिक जीव नहीं जानता।