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  1. प्रात: काल ही ऊठि के - श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावाणी, सेवा सुख (04)

    श्री हरिव्यास देवाचार्य कहते हैं कि इस रसोपासना मार्ग के साधक को चाहिए कि वह प्रातःकाल उठकर सखी का बाह्य वेश धारण न करे, अपितु सखीभाव को अपने अंतःकरण में धारण करे। उस अन्तःचिन्तित सखीभाव के द्वारा वह अपने निज स्वरूप—अर्थात् निकुञ्ज में स्थित अपने नित्य सेवामय (या गुरुप्रदत्त सिद्ध) स्वरूप—से भावपूर्वक एकरूप हो। नित्य सहचरी-स्वरूप की सेवा में प्रविष्ट होने का यही एक उपाय है।

  2. राधिका-रवन जय नवलकुँवरि - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (60)

    श्री राधिका-रमण की जय हो! नित्य नवयौवना किशोरी, श्री राधिका महारानी, श्री धाम वृन्दावन में वास करने वाले को अपनी अंतरंगा दासी-भाव प्रदान कर, उसको अथाह रस प्रदान करती हैं।

  3. वृन्दावन परम मधुर सुखदानी भाव - श्री राधाचरण दास, वृन्दावन विरुदावली (7)

    श्री धाम वृन्दावन परम मधुर और समस्त सुखों को देने वाला है। जो भी मनुष्य यहाँ भावपूर्वक निवास करता है, वह स्वाभाविक रूप से रस की खान बन जाता है।

  4. राधे जू रंग भीनी राजकुँवारि - श्री किशोरी अलि

    श्री राधा रानी के अनुपम सौंदर्य और प्रिया-प्रियतम के निकुंज-मिलन का गान करते हुए किशोरी अलि कहते हैं— हमारी स्वामिनी श्रीराधे जू प्रेम-रस के रंग में सराबोर नित्य किशोरी राजकुमारी हैं। वे अलौकिक लाड़िली, परम लजीली, अनुपम अलबेली और सदा सुकुमार हैं।

  5. भाव अनोखी वस्तु है जो कर जाने कोय - श्री रूप माधुरी जी की वाणी, भाव महिमा अंग (5)

    ‘भाव’ अर्थात आंतरिक भावना एक विलक्षण तत्व है, जिसका वास्तविक मर्म कोई विरला व्यक्ति ही अनुभूति द्वारा जान पाता है। श्री रूपमाधुरी जी कहते हैं कि संसार में अनुभव होने वाले सुख और दुःख का मूल कारण मनुष्य के अपने भाव ही हैं।

  6. प्रथम सहचरी भाव हिय - श्री रामराय जी, आदिवाणी (102.1)

    सर्वप्रथम अपने हृदय में सहचरी-भाव धारण करके स्वयं को मानसी-भाव से कुंज के द्वार पर उपस्थित करना चाहिए, जहाँ मंगलमय श्री युगल किशोर की विविध प्रकार से प्रेमपूर्वक सेवा करते हुए उनका गुणगान करना चाहिए।

  7. पंच रसन में मुख्य है उत्तम रस श्रृंगार - श्री सरस माधुरी

    भक्ति के पाँच मुख्य रसों में 'श्रृंगार रस' ही सर्वोपरि और उत्तम है। साधक को अपने हृदय में सहचरी भाव धारण कर, उन सुकुमार युगल सरकार (श्री राधा-कृष्ण) की निष्काम सेवा करनी चाहिए।

  8. वृद्धयर्थात् राधधातोश्व राधा - श्री वागीश शास्त्री जी, श्री राधा नाम सुधा (5)

    ‘राधा’ शब्द ‘राध्’ धातु से उत्पन्न है, जिसका अर्थ है वृद्धि करना या उन्नति देना। इसी कारण भक्तजन श्रीराधा को ब्रह्म से भी अधिक गुण सम्पन्न मानते हैं। श्रीराधा स्वयं वर्धमान रहती हुई अपने भक्तों के भी भाव (रस) आदि की वृद्धि सदा करती रहती हैं ।

  9. नित्यं भक्तपराधीना तेन राधा बिहारिणी - श्री वंशीअलि, श्री राधासिद्धांत (21)

    श्री राधिका महारानी नित्य ही भक्त के आधीन हैं। श्री कृष्ण उनके अनन्य भक्त हैं, उनकी भक्ति के आधीन होकर, स्वामिनीजी समान भाव से, श्री कृष्ण के संग विहार करती हैं । अपने भक्त की रुचि के अनुसार ही स्वामिनी जी उस रस से ही भक्त को भी भजती हैं।

  10. अनन्य व्रत खाँडेकीसी धार - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (175)

    अनन्य-भक्ति का व्रत तलवार की धार के समान सूक्ष्म और कठिन है। यदि मन इधर-उधर डगमगाकर संसार के मोहों में फिसल जाता है, तो फिर यद्यपि हरि जगत के हितैषी हैं, परन्तु ऐसी डगमगाई भक्ति का वे सम्हार (स्वीकार) नहीं करते।

  11. कबहूँ हकधक हो रहै, उठै प्रेम हित गाय - श्री सहजो बाई

    सच्चे प्रेमी भक्त के लक्षण बताते हुए सहजो बाई कहती हैं कि कभी वह भक्त प्रेम-भाव में इतना डूब जाता है कि स्तब्ध रह जाता है और उसे बाहर की कोई सुधि नहीं रहती। कभी-कभी वही प्रेम का वेग उसे सहसा गाने के लिए प्रेरित करता है। कभी वह आँखें मूँदकर ध्यान में लीन हो जाता है, और कभी अपनी चेतना में लौटकर बाह्य जगत की सुधि में आ जाता है।

  12. षट् मुक्ति की चाह तजि - श्री गुरु छौनाजी महाराज

    युगल रस के उपासक न केवल भुक्ति (सांसारिक) बल्कि छः प्रकार की मुक्ति (सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य, सायुज्य, सारष्टि एवं कैवल्य) की कामना को भी त्याग देते हैं। वे प्रिया-प्रियतम में निष्काम प्रेम को बढ़ाकर, संसार के आवागमन से सहजता से मुक्त हो जाते हैं एवं उनकी महल-टहल को प्राप्त कर लेते हैं। ऐसे उपासक प्रेम में अनुरक्त होकर युगल विहार का भावपूर्ण नेत्रों से सदा दर्शन करते रहते हैं।

  13. गहवर बन अरु साँकरी, गलियन लीला होय - ब्रज के दोहे

    गह्वर वन अथवा साँकरी खोर में जो राधा-कृष्ण की मधुर लीलाएँ होती हैं, उनका वास्तविक अनुभव तभी हो सकता है जब किसी का हृदय विशुद्ध प्रेम और सुंदर भक्ति-भाव से भरा हुआ हो। भावशून्य व्यक्ति के लिए यह एक स्थान मात्र है ।

  14. श्री हरिदास अनन्य जै, जिनकै प्रेम प्रधान - श्री रूप सखी, सिद्धांत के दोहा (31)

    जो रसिकजन स्वामी श्री हरिदास जी के पूर्ण रूप से अनुगामी होते हैं, उनकी प्रधानता केवल प्रेम की ही होती है । वे सखीभाव को अंगीकार कर, प्रिया-प्रियतम को नित्य लाड़ लड़ाते हुए, उनकी रूप-माधुरी का सतत पान करते रहते हैं ।

  15. वनराज हमारे प्यारे हैं - श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धांत के पद (91)

    वनों का राजा, श्रीधाम वृंदावन हमको (रसिकों को) अत्यंत प्यारा है। यह इस भूतल पर नित्य सदा विराजता है एवं दिव्य प्रेम-रस का मूल स्रोत है।

  16. गृह बन में जित तित रहो गहो मानसी सेव - श्री सरस माधुरी

    चाहे घर में वास करो अथवा वन में, सदा युगल सरकार श्री राधा-कृष्ण की मानसी सेवा में लीन रहो। श्री सरस माधुरी कहते हैं— “अपने हृदय में सुंदर भाव उत्पन्न करो, सहचरी स्वरूप धारण करो और निकुंज सेवा का परम आनंद प्राप्त करो।”