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  1. श्रीहरिवंश चरण बिनु बल गहौं - श्री हित चतुर्भुजदास जी

    श्री हित हरिवंश महाप्रभु के चरणों के अतिरिक्त मैं और किसका बल (आश्रय) ग्रहण करूँ? जिनके लिए लाड़ली-लाल (श्री राधा-कृष्ण) का दिव्य केलि-मिलाप और सुखदायक श्री वृन्दावन ही एकमात्र वास्तविक धन है।

  2. छिन-छिन हैं नव लाड़ली करिये - श्री हित गोपाल दास, निकुंज रस वल्लरी, आशीष दोहा

    क्षण-क्षण नित्य नवीन रहने वाली श्री लाड़ली जी और प्रियतम श्यामसुन्दर निरंतर दिव्य रास-क्रीड़ा का विलास करते रहें। आप दोनों का यह परम निर्मल और श्रेष्ठ प्रेम नित्य नवीन भाव से दिव्य रस और आनंद से सदैव परिपूर्ण बना रहे।

  3. प्यारी अति रस प्रेम प्रवीन - श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जू की वाणी, रस के पद (185)

    परम रसीली तथा प्रेम की कलाओं में निपुण हमारी श्री प्यारी जू (राधा) अत्यंत सुकोमल और लाडली हैं, जो अपने प्रीतम को नित्य-नवीन लाड लड़ाती हैं।

  4. जै जै कीरति लाड़ली जै नँदनँदन अधार - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद

    कीर्ति कुमारी श्री लाडिली जी (श्री राधा) की बारम्बार जय-जयकार हो, जो नंदलाल (श्री कृष्ण) के जीवन का एकमात्र आधार हैं। उन परम रस की पुंज, स्वामिनी जी की सर्वदा जय हो, जो अपने दासों के हृदय का सार तथा उनकी परम आशा हैं।

  5. टेरत श्यामाश्याम को दया विरह बिहाल - श्री दयाबाई

    श्रीधाम वृन्दावन की पावन रज में श्यामा-श्याम के साक्षात्कार के दिव्य अनुभव को दयाबाई जी ने इस दोहे में व्यक्त किया है। वे कहती हैं कि विरह-वेदना से व्याकुल होकर जब वे निरंतर श्यामा-श्याम को पुकार रही थीं, तब एक दिन अचानक किसी कुंज में उन्हें श्री लाड़िली-लाल के दर्शन हो गए, और वे पूर्णतः कृतार्थ हो गईं।

  6. ललितप्रिये हरिदासि जू नित्य केलि सुख दानि - श्री ललितकिशोरी देव जू की वाणी, विशिष्ट पद एवं साखी (65)

    श्री ललिता सखी के अवतार, स्वामी श्री हरिदास जी महाराज, प्रिया-प्रियतम की नित्य-केली-रस के प्रदाता अनन्य रसिकाचार्य हैं। उनकी कृपा से साक्षात्‌ रस की खान, कुंजबिहारिणी लाड़िली, श्री राधा महारानी सहजता से भक्त के सम्मुख प्रकट हो जाती हैं।

  7. मैं दरसन बिन अनमनी, बैठोंगी मुख मोर - श्री प्रेमदास जी (लाल बलबीर जी के भ्राता), श्री प्रेम दास जी की वाणी (86.4)

    श्री राधा के दर्शन प्राप्त न होने पर मैं व्याकुल होकर उनसे प्रेम में मान कर, मुख मोड़कर बैठूँगी। ऐसा कब होगा कि तब मेरी लाड़ली (राधा) आकर मुझसे कहेंगी, “तुम्हारा हृदय क्यों व्याकुल है, तुम क्यों मुझसे रूठी हुई हो?”

  8. अहो कृपामयी लाड़ली - श्री हित गोपाल दास [सेवा कुञ्ज वाले], निकुंज रस वल्लरी, आशीस दोहा (5)

    हे परम करुणामयी लाड़ली, परम उदार प्यारी जू आपकी जय हो! वन में मंजुल रस बरसाने वाली, रसिकों की प्राणाधार, श्री राधा महारानी की जय हो ।

  9. जय श्रीराधिका रवनी - श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावाणी, सहज सुख (59)

    हे प्राणप्रियतम की प्रियतमा स्वामिनी जू! हे श्री विहारिणी लाड़ली जू, हे रसिक रमणी जू! आपकी जय हो। लाल को सुख प्रदान करके आप ही वास्तविक सुख से सनी हुई हैं।

  10. करुणा करि अब लाडली दीनी सन्मुख ठौर - श्री हित गोपाल दास, निकुंज रस वल्लरी, आशीस दोहा (3)

    हे लाड़िली जी (श्री राधा)! आपने बड़ी करुणा करी जिसके फल स्वरूप आपके अभिन्न स्वरूप श्री धाम वृंदावन में आपने अपने संग में मुझे वास दिया । बस अब यही आशा है कि क्षण क्षण आपके श्री चरणों में मेरी प्रीति बढ़ती रहे, और आपके अतिरिक्त अन्य किसी का भान न रहे ।

  11. तो सम को प्यारो नहि प्यारी - श्री केवल राम जी, रास मान के पद (5)

    एक सखी, माननी श्री राधिका से कहती हैं, हे प्यारी, तुम्हारे जैसा प्रियतम किसी का नहीं है। तुम ही तो लालजी (श्रीकृष्ण) का तन, मन, धन और प्राण हो, जैसे चंद्रमा की उजियारी किरणें होती हैं ।

  12. रसिक तबहिं पहिचानिये जाके यह रस-रीति - ब्रज के दोहे

    वही वास्तव में रसिक कहलाने योग्य है, जिसके हृदय में ऐसी रस-पद्धति स्थापित हो जाए कि श्री राधा-कृष्ण की मधुर झाँकी एवं लीलाएँ उसे प्रत्येक क्षण अनुभव होती रहें।

  13. परम दयाल दूजी आपसी न दीसै और - श्री लाल बलबीर जी, ब्रज बिनोद, महल वर्णन (8)

    हे श्री राधा, आप परम दयालु हैं और आपके जैसा मुझे कोई और दिखाई नहीं देता। हे सिरमौर, मैं आपके चरण कमलों में बारम्बार प्रणाम करता हूँ।