प्यारी अति रस प्रेम प्रवीन - श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जू की वाणी, रस के पद (185)
परम रसीली तथा प्रेम की कलाओं में निपुण हमारी श्री प्यारी जू (राधा) अत्यंत सुकोमल और लाडली हैं, जो अपने प्रीतम को नित्य-नवीन लाड लड़ाती हैं।
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परम रसीली तथा प्रेम की कलाओं में निपुण हमारी श्री प्यारी जू (राधा) अत्यंत सुकोमल और लाडली हैं, जो अपने प्रीतम को नित्य-नवीन लाड लड़ाती हैं।
कीर्ति कुमारी श्री लाडिली जी (श्री राधा) की बारम्बार जय-जयकार हो, जो नंदलाल (श्री कृष्ण) के जीवन का एकमात्र आधार हैं। उन परम रस की पुंज, स्वामिनी जी की सर्वदा जय हो, जो अपने दासों के हृदय का सार तथा उनकी परम आशा हैं।
श्रीधाम वृन्दावन की पावन रज में श्यामा-श्याम के साक्षात्कार के दिव्य अनुभव को दयाबाई जी ने इस दोहे में व्यक्त किया है। वे कहती हैं कि विरह-वेदना से व्याकुल होकर जब वे निरंतर श्यामा-श्याम को पुकार रही थीं, तब एक दिन अचानक किसी कुंज में उन्हें श्री लाड़िली-लाल के दर्शन हो गए, और वे पूर्णतः कृतार्थ हो गईं।
श्री ललिता सखी के अवतार, स्वामी श्री हरिदास जी महाराज, प्रिया-प्रियतम की नित्य-केली-रस के प्रदाता अनन्य रसिकाचार्य हैं। उनकी कृपा से साक्षात् रस की खान, कुंजबिहारिणी लाड़िली, श्री राधा महारानी सहजता से भक्त के सम्मुख प्रकट हो जाती हैं।
श्री राधा के दर्शन प्राप्त न होने पर मैं व्याकुल होकर उनसे प्रेम में मान कर, मुख मोड़कर बैठूँगी। ऐसा कब होगा कि तब मेरी लाड़ली (राधा) आकर मुझसे कहेंगी, “तुम्हारा हृदय क्यों व्याकुल है, तुम क्यों मुझसे रूठी हुई हो?”
नित्य विहार के अपार रस में रंगे, श्री लाड़ली लाल अपने तन और मन की सुधि को भुलाए हुए, उस महारस सिंधु में सदा मगन हैं।
हे परम करुणामयी लाड़ली, परम उदार प्यारी जू आपकी जय हो! वन में मंजुल रस बरसाने वाली, रसिकों की प्राणाधार, श्री राधा महारानी की जय हो ।
हे प्राणप्रियतम की प्रियतमा स्वामिनी जू! हे श्री विहारिणी लाड़ली जू, हे रसिक रमणी जू! आपकी जय हो। लाल को सुख प्रदान करके आप ही वास्तविक सुख से सनी हुई हैं।
यह बाग़ लाड़िली श्री राधा एवं ललितेश श्री कृष्ण का है, जो सदैव बसंत ऋतु से आच्छादित रहता है।
श्री वृन्दावन धाम की महिमा अपरम्पार है, जहाँ श्री राधा कृष्ण नित्य विहार करते हैं।
हे लाड़िली जी (श्री राधा)! आपने बड़ी करुणा करी जिसके फल स्वरूप आपके अभिन्न स्वरूप श्री धाम वृंदावन में आपने अपने संग में मुझे वास दिया । बस अब यही आशा है कि क्षण क्षण आपके श्री चरणों में मेरी प्रीति बढ़ती रहे, और आपके अतिरिक्त अन्य किसी का भान न रहे ।
श्री लाड़ली जू के महल बरसाने की शोभा ही निराली है जिसके पास बाग और बगीचे हैं जो मधुर मधुर वृक्षों से आच्छादित हैं ।
मेरी गुरु, माता, पिता केवल एक श्री लाडिली किशोरी श्री राधिका हैं, केवल इन्हीं का बल ही मेरे हृदय में हर क्षण समाया हुआ है ।
एक सखी, माननी श्री राधिका से कहती हैं, हे प्यारी, तुम्हारे जैसा प्रियतम किसी का नहीं है। तुम ही तो लालजी (श्रीकृष्ण) का तन, मन, धन और प्राण हो, जैसे चंद्रमा की उजियारी किरणें होती हैं ।
श्री ललिता जी की जय हो जिनका निज आनंद कोई और नहीं स्वयं श्री राधा हैं जिन्हें वे बड़े ही प्रेम से लाड़ लड़ाती हैं।
हे स्वामिनी जू, इतना तो कीजिये कि इस संसार की आसक्ति को छुड़ाकर श्री वृन्दावन का नित्य वास प्रदान कीजिये।
वही वास्तव में रसिक कहलाने योग्य है, जिसके हृदय में ऐसी रस-पद्धति स्थापित हो जाए कि श्री राधा-कृष्ण की मधुर झाँकी एवं लीलाएँ उसे प्रत्येक क्षण अनुभव होती रहें।
हे श्री राधा, आप परम दयालु हैं और आपके जैसा मुझे कोई और दिखाई नहीं देता। हे सिरमौर, मैं आपके चरण कमलों में बारम्बार प्रणाम करता हूँ।
श्री लाड़ली जी (राधा) नित्य विहार करने वाली हैं और श्री लाल जी (कृष्ण) भी नित्यविहारी हैं। इन दोनों युगल की केली-क्रीड़ा अत्यंत मधुर रस से भरी हुई है, जो साक्षात् आनंद का ही रसमय स्वरूप है।
श्री राधा कृपा पर स्वयं को बलिहार कर दीजिए । श्री वृंदावन जाकर नित्य ही “राधा राधा" रटिए ।